रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ रसखान-ग्रन्थावली अपह्नति— जहाँ प्रकृत का—उपमेय का—निषेध करके अप्रकृत का—उपमान का— आरोप किया जाता है वहाँ अपन्हुति अलंकार होता है। रसखान ने इस अल- कार का प्रयोग निम्नलिखित सवैये में किया है।— “है छलकी अप्रतीत की मूरति मोद बढ़ावै विनोद कलाम मे। हाथ न ऐहै कछु रसखान तू क्यो बहकै विप पीवत धाम मे। है कुच कंचन के कलसा न ये आम की गाठ मठीक की चाम मे। बैनी नही मृगनैनिन की ये नसैनी लगी यमराज के धाम मे॥’ यहाँ पर कुच और चोटियो का निषेध करके उन पर आम की गांठ और नसैनी का आरोप किया गया है। व्यतिरेक जहाँ उपमान की अपेक्षा उपमेय के उत्कर्ष का वर्णन किया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। यथा— ‘धूरि भरे अति सोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनी बाजत पीरी कछौटी। या छवि को रसखानि विलोकत वारत काम कला निज कोटी। काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सो लै गयौ माखन रोटी।’ इस सवैये मे कामदेव के रूप की अपेक्षा कृष्ण के सौन्दर्य का उत्कर्षपूर्ण वर्णन है। दृष्टांत जहाँ उपमेय, उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव हो, वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है। यथा— ‘जा दिन तै निरख्यो नन्द नन्दन कानि तजी घर बंधन छूट्यौ। चारु विलोकनि कीनी सुमार सम्हार गई मन मोर न लूट्यौ। सागर को सलिला जिमि धावे न रोकी रहै कुल को पुल टूट्यौ। मत्त भयी मन संग फिरै रसखान सरूप सुधारस छूट्यौ।” अर्थान्तरन्यास जहाँ विशेष से सामान्य का, या सामान्य से विशेष साधर्म्य का वैधर्म्य के द्वारा समर्थन किया जाए, वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। यथा—