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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१४० रसखान-ग्रन्थावली यहाँ सुलझाने वाली गुडी उलझा देती है । अतः असंगति अलंकार है । इस विवेचन के पश्चात् यह कहना कठिन नहीं कि रसखान की अलंकार योजना बहुत ही सफल और प्रभाववर्द्धक है । इन्होंने अलंकारों का प्रयोग श्रम द्वारा नहीं किया वरन् ये तो स्वतः भावावेग में आ गए हैं । स्वाभाविक रूप से आए हुए अलंकार भावों में प्रभाव और गति उत्पन्न कर देते हैं, यह निर्वि- वाद मत है । जहाँ अलंकार अभिव्यक्ति के साधन और सहायक होते हैं वहीं इनका प्रयोग सार्थक होता है । रसखान की अलंकार-योजना ऐसी ही है । गुण-योजना रस के उत्कर्ष को बढ़ाने वाले धर्मों को गुण कहा जाता है । वस्तुतः गुण शब्द-योजना का ही दूसरा नाम है । वही काव्य सर्वोत्तम माना जाता है जो भाव-गरिमा से भी मंडित हो और क्लिष्ट भी न हो; अर्थात् प्रसादगुण-सम्पन्न हो । रसखान के काव्य में यह विशेषता पाई जाती है । उनका शब्द-चयन अत्यन्त प्रचलित शब्दों का है । संस्कृत, उर्दू तथा फ़ारसी के वे ही शब्द इन्होंने अपनाए हैं जो खूब प्रचलित हैं । इनके पदों की भाव-मयता और सरलता में प्रायः होड़ सी लगी हुई है । प्रसादगुण के उदाहरणार्थ इनका समूचा काव्य प्रस्तुत किया जा सकता है; फिर भी कुछ पदों को उद्धृत करना उचित प्रतीत होता है । नायिका की सुकुमारता से सम्बद्ध दो सवैये देखिए— 'कौन की नागरि रूप की आगरि जाति लिये संग कौन की बेटी । जाको लसै मुख चन्द समान सुकोमल अंगनि रूप-लपेटी । लाल रही चुप लागिहै डीठि भुजाकै कहैं उर बात न पेटी । टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ॥' × × × 'यह जाको लसै मुख चन्द समान कमान सी भौंह गुमान हरै । अति दीरघ नैन सरोजहु तैं मृग खंजन मीन की पाँति डरै । रसखानि उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै । कही नीके नवैं कटि हार के भार सो तामों कहै सब काम करै ॥' छन्द-योजना छन्द और काव्य का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । आदिकाल से ही काव्य में छन्द की महिमा मानी गई है । वेदों में एक कथा आती है जिसमें बताया गया है कि देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए छन्द का परिधान ग्रहण किया