रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४१ समीक्षा भाग था। इसका तात्पर्य यह है कि छन्द काव्य को अमरता प्रदान करता है। प्राचीन साहित्य की जीवन-रक्षा के एकमात्र आधार छन्द ही है। छन्द-प्रयोग से ही काव्य मे सरसता, सजीवता एव प्रभावोत्पादकता आती है। रसखान ने अपने काव्य मे तीन छन्दो का प्रयोग किया है—सवैया, कवित्त और दोहा। सवैया वर्णिक वृत्त है। इसके लय तथा सौष्ठव की आचार्यो द्वारा भारी प्रशसा की गई है। लय के आरोह और अवरोह के साथ पाठक अथवा श्रोताओ के हृदयो को चमत्कृत कर देना इस छन्द की प्रमुख विशेषता है। इसमे एक निश्चित स्वर-विधान होता है जिसके कारण इसमे एक अनूठे संगीत का जन्म होता है। गणो तथा अन्त के गुरु-लघु अक्षरो की दृष्टि से सवैया के अनेक भेद हो सकते हैं, पर इसके तीन भेद मुख्य है— १. भगणाश्रित सवैया २ सगणाश्रित सवैया ३ जगणाश्रित सवैया भगणाश्रित सवैया के मदिरा, मोद, मत्तयगद, चकोर, अरसात और किरीट छ भेद माने गये है। मदिरा मे सात भगण और अन्त का अक्षर गुरु होता है। मोद मे पाँच भगण, एक मगण, एक सगण और अन्त का अक्षर गुरु होता है। मत्तगमंद मे सात भगण और अन्त का अक्षर गुरु होता है। चकोर मे सात भगण और अन्त के अक्षर गुरु-लघु होते है। अरसात मे सात भगण और अन्त मे रगण होता है। किरीट मे आठ भगण होते है। भगणाश्रित सवैया के इन भेदो को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है— मदिरा भगण ७ + S मोद भगण ५ + मगण + सगण + S मत्तगयद भगण ७ + S चकोर भगण ७ + S I अरसात भगण ७ + रगण किरीट भगण ८ जगणाश्रित सवैया के तीन भेद होते है—सुमुखी, मुक्तहरा और बाम। सुमुखी मे सात जगण और अंत के अक्षर लघु-गुरु होते है। मुक्तहरा मे आठ जगण होते है। बाम मे सात जगण और एक यगण होता है। ये भेद इस प्रकार दिखाये जा सकते है—