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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 368 में से

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पृष्ठ 159

१४५ रसखान-ग्रन्थावली सुमुखी जगण ७+७ । ऽ मुखतहरा जगण ८ वाम जगण ७+यगण सगणाश्रित सवैया के भी तीन भेद होते है—दुर्मिल, सुन्दरी और अर- विन्द । दुर्मिल मे आठ सगण होते है। सुन्दरी मे आठ सगण और अन्त का अक्षर लघु होता है। अरविन्द मे आठ सगण और अंत का अक्षर लघु होता है। इन भेदो को इस प्रकार दिखाया जा सकता है— दुर्मिल सगण ८ सुन्दरी सगण ८+ऽ अरविन्द सगण ८+। रसखान के काव्य मे इनमे से अधिकांश भेद मिल जाते है। सवैया लिखने मे इन्हे जैसी सफलता मिली है, वैसी हिन्दी के विरले कवियो को ही मिल पाई है। इसलिए रसखान और सवैया दोनो शब्द पर्यायवाची से बन गये है। कवित्त के अनेक भेद हो सकते है, पर मुख्य दो ही माने जाते हैं—मनहर और घनाक्षरी । मनहर मे ३१ तथा घनाक्षरी मे ३२ अक्षर होते हैं। आठ- आठ अक्षरो के वाद यति का विधान है। पर यह विधान लय पर निर्भर होता है, इसीलिए कभी-कभी १६ अक्षर के बाद भी विराम दिया जाता है। कही- कही पर आठ के स्थान पर ७ या ६ पर भी यति पड जाती है। इनके अति- रिक्त इनके विषय मे और भी अनेक सूक्ष्म नियम है जो लय माधुरी के आधार पर निर्धारित किये गये हैं। दोहे मे विषम चरणो मे तेरह-तेरह मात्राएं और सम चरणो मे ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती है। रसखान ने कवित्त और दोहे का भी प्रचुरता से प्रयोग किया है। प्रेम-वाटिका तो दोहो मे ही रची गई है। अतः कहा जा सकता है कि छन्द-योजना की दृष्टि से भी रसखान सफल है। लोकोक्तियां लोकोक्तियो के प्रयोगो से भाषा मे सजीवता आती है। रसखान ने अपने कवित्तो मे और सवैयो मे यथावसर लोकोक्तियो के प्रभावशाली प्रयोग किये है। यथा— १. 'मोल कला के लला न विकैहो'

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