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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

१४५ रसखान-ग्रन्थावली सुमुखी जगण ७+७ । ऽ मुखतहरा जगण ८ वाम जगण ७+यगण सगणाश्रित सवैया के भी तीन भेद होते है—दुर्मिल, सुन्दरी और अर- विन्द । दुर्मिल मे आठ सगण होते है। सुन्दरी मे आठ सगण और अन्त का अक्षर लघु होता है। अरविन्द मे आठ सगण और अंत का अक्षर लघु होता है। इन भेदो को इस प्रकार दिखाया जा सकता है— दुर्मिल सगण ८ सुन्दरी सगण ८+ऽ अरविन्द सगण ८+। रसखान के काव्य मे इनमे से अधिकांश भेद मिल जाते है। सवैया लिखने मे इन्हे जैसी सफलता मिली है, वैसी हिन्दी के विरले कवियो को ही मिल पाई है। इसलिए रसखान और सवैया दोनो शब्द पर्यायवाची से बन गये है। कवित्त के अनेक भेद हो सकते है, पर मुख्य दो ही माने जाते हैं—मनहर और घनाक्षरी । मनहर मे ३१ तथा घनाक्षरी मे ३२ अक्षर होते हैं। आठ- आठ अक्षरो के वाद यति का विधान है। पर यह विधान लय पर निर्भर होता है, इसीलिए कभी-कभी १६ अक्षर के बाद भी विराम दिया जाता है। कही- कही पर आठ के स्थान पर ७ या ६ पर भी यति पड जाती है। इनके अति- रिक्त इनके विषय मे और भी अनेक सूक्ष्म नियम है जो लय माधुरी के आधार पर निर्धारित किये गये हैं। दोहे मे विषम चरणो मे तेरह-तेरह मात्राएं और सम चरणो मे ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती है। रसखान ने कवित्त और दोहे का भी प्रचुरता से प्रयोग किया है। प्रेम-वाटिका तो दोहो मे ही रची गई है। अतः कहा जा सकता है कि छन्द-योजना की दृष्टि से भी रसखान सफल है। लोकोक्तियां लोकोक्तियो के प्रयोगो से भाषा मे सजीवता आती है। रसखान ने अपने कवित्तो मे और सवैयो मे यथावसर लोकोक्तियो के प्रभावशाली प्रयोग किये है। यथा— १. 'मोल कला के लला न विकैहो'

समीक्षा भाग १४३ २. नाहिं उपजैगो बाँस नाहि बाजै फेर बाँसुरी' ३. 'छोरा जायो कि मेव मँगायो' ४. 'नेम कहा जब प्रेम कियो' इस विवेचन के उपरान्त यह कहना अनुचित नही कि रसखान की भाषा सभी दृष्टियो से सफल एव सार्थक है। एक विशिष्ट भाषा मे जिन गुणो की अपेक्षा होती है, वे सब रसखान की भाषा मे मिलते है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दो मे— 'इनकी (रसखान की) भाषा बहुत चलती, सरल और शब्दाडम्बर मुक्त होती थी। शुद्ध ब्रजभाषा का जो चलतापन और सफाई रसखान और घनानंद की रचनाओ मे है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।'

: ११ : स्वच्छन्दधारा और रसखान रीतिकाल मे दो धाराएँ प्रमुख थी—रीतिबद्ध धारा और रीति-मुक्तधारा रीतिबद्ध धारा के कवि और आचार्य परम्परा के निर्वाह मे सदैव सतर्क और जागरूक रहते थे । भावो की अपेक्षा वे परम्परा तथा काव्य शास्त्रीय नियमों को प्राथमिकता देते थे। रीतिमुक्तधारा के कवियो के आदर्श रीतिबद्धधारा के कवियो के आदर्शों के बिल्कुल विपरीत थे। वे काव्यशास्त्रीय नियमो तथा परम्परा की अपेक्षा भावो को अधिक महत्व देते थे। इसीलिए इस धारा को स्वच्छन्दधारा भी कहा जाता है। इस धारा की निम्नलिखित विशेषताएँ है— १. भावावेश का प्राधान्य २ कृत्रिम व्यापारो का त्याग ३. भावो की प्रधानता ४ आत्म-निवेदन ५. विरह-वेदना ६. आत्मानुभूति ७. प्रेम का स्वस्थ निरूपण ८ भक्ति का वास्तविक रूप १ भावावेश का प्राधान्य—रीतिबद्ध और रीतिमुक्त कवियों के काव्य- रचना के प्रयोजनो मे आकाश-पाताल का अन्तर था। रीतिबद्ध कवि केवल दो प्रयोजनो से काव्य-रचना किया करते थे—आश्रयदाता का मनोरजन और पांडित्य-प्रदर्शन । इसलिए इनके काव्य प्राय श्रमसाध्य होते थे । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवि भावावेश के कारण ही काव्य-रचना करते थे । इस विषय की ओर संकेत करते हुए घनानन्द ने लिखा है— १४४

समीक्षा भाग १४५ 'लोग है लाग कवित्त बनावत मोही तो मेरे कवित्त बनावत ।' यही कारण है कि रीति बद्ध कवियो की अपेक्षा रीति मुक्त कवियो के काव्यो मे अधिक भावप्रवणता है । २. कृत्रिम व्यापारो का त्याग—रीतिमुक्त कवियो का काव्य भावनापूर्ण था, अत इसमे अभिव्यक्ति व कृत्रिम व्यापारो का त्याग स्वाभाविक ही था । इन कवियो ने न तो श्रम करके शब्दो की योजना की है और न भाषा के रूप को सँवारा है । इनकी भाषा सहज और स्वाभाविक है । उसमे कही भी कृत्रि- मता दृष्टिगोचर नही होती । अलकार और लोकोक्तियाँ आदि के प्रयोग भी स्वाभाविक होने के कारण भावाभिव्यक्ति मे पूर्णत सहायक हुए है । इनके अतिरिक्त विषयो की कृत्रिमता भी इन कवियो को ईप्सित नही थी । बाह्य कृत्रिमताओ को सोचना और उनका वर्णन करना इन कवियो को न तो रुचता था और न वे इस ओर ध्यान ही देते थे । ये उन व्यापारो के प्रदर्शन की चेष्टाओ को भी निरर्थक मानते थे । यही कारण है कि स्वच्छन्द- धारा के कवियो मे विरह और मिलन दोनों मे प्रेमियो के हृदय के आन्तरिक पक्षो को उद्घाटित करने की होड सी लगी रही है । ३. भावो की प्रधानता—इन कवियो के काव्यो मे भावो की प्रधानता है । भाव-प्रधान होने के कारण इनके काव्यो मे चिन्तन-पथ दुर्बल है । रीतिबद्ध कवि बुद्धि के बल से ही भावो का अनुमान करते थे और बुद्धि के बल से ही प्रेम के बाह्य रूप का विधान करते थे । रीतिमुक्त कवि हृदय को ही प्रधान मानते थे और अपने समूचे काव्य की रचना हृदय की प्रेरणा के आधार पर ही करते थे । ४. आत्म-निवेदन—अपने भावो को अभिव्यक्ति मे ये कवि इतने निर्भीक है कि जो कुछ कहना चाहते है, स्पष्ट कह देते है । किसी अन्य माध्यम का सहारा नही लेते । रीतिबद्ध कवि अपनी प्रेमाभिव्यजना के लिए, सामाजिक भय के कारण जिन आवरणो को लपेटते चलते है, उनका इन कवियो के काव्यो मे एकदम अभाव है । साथ ही इन कवियो मे भक्ति की सच्ची एव वास्तविक अनुभूति थी, अत अपने आराध्य के समक्ष अपना हृदय खोलकर रख देने की इनमे क्षमता है ।

१४६ रसखान-ग्रन्थावली ५. विरह-वदना--इन कवियो ने प्रेम की हृदयगम्य अभिव्यक्ति की है और इनका प्रेम लौकिक से अलौकिक बना है, अत. इनमे प्रेम के विरह पक्ष की वास्तविकता मिलती है । ये कवि जिस प्रकार सयोग-वर्णन मे अन्तर्मुख रहते है और उसी प्रकार वियोग वर्णन मे भी रहते हैं । बल्कि वियोग वर्णन में इनकी अन्तर्मुखता और भी अधिक बढ जाती है । इसीलिए इनके विरह-वर्णन मे जो स्वाभाविकता और मार्मिकता है, वह रीतिबद्ध कवियों के काव्यो मे नही मिलती । विरह के प्राय सभी पक्षो को लेकर ये कवि चले हैं । इनमें विरह-वेदना की इतनी प्रधानता है कि सयोग मे भी ये लोग एक प्रकार का वियोग-सा ही देखते है । अत इन्हे न तो सयोग मे शान्ति है और न वियोग मे । इनका विरह-वर्णन अन्तर्मुखी है, रीतिबद्ध कवियो की भाँति बहिर्मुखी और मासल नही । ६. आत्मानुभूति--रीतिमुक्त कवियो ने सदैव हृदय को प्रधानता दी, फलतः इनके काव्यो मे अत्मानुभूति का अंश पर्याप्त मात्रा मे पाया जाता है । रीति- बद्ध कवियो की भाँति बुद्धि के बल पर, इन्होने दूर की कौड़ी लाने का कभी प्रयत्न नही किया, जिन भावो से इनका परिचय था और जो भाव इनके हृदय की सीमा मे सहज स्वाभाविक रूप से आ सकते थे, उन्हे ही इन कवियो ने अपनाया और उन्ही की अभिव्यक्ति की । इसीलिए इन कवियो के काव्यो में आत्मानुभूति का पक्ष प्रबल है । ७ प्रेम का स्वस्थ रूप--रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियो ने लौकिक श्रृंगार को महत्ता दी और अथ से इति तक उसी का वर्णन किया । फलतः उनके काव्य मे प्रेम का मासल रूप ही सुरक्षित रह गया । प्रेम-भाव के जो अन्य सूक्ष्म एव उदात्त अंग होते हैं, उनकी ओर न तो इन कवियो ने कोई ध्यान ही दिया और न ऐसा करना इनके लिए आवश्यक था । अत. प्रेम इनकी दृष्टि मे एक प्रकार का प्रमुखतम काम-भाव ही बनकर रह गया । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवियो ने प्रेम को हृदय के एक उदात्त भाव के रूप मे ग्रहण किया और इसकी स्वस्थता का आद्योपात वर्णन किया । इनकी दृष्टि मे प्रेम का पथ ही एक ऐसा पथ है जो परमात्मा तक आत्मा को ले जाने मे समर्थ है । एक बात और, रीतिबद्ध कवियो ने प्रेम के सम-रूप पर जोर दिया है और रीतिमुक्त कवियो ने विषम-रूप पर । इनकी दृष्टि से, स्वच्छन्द प्रेम

समीक्षा भाग १४७

का चरम् उत्कर्ष विषमता मे ही निष्पन्न होता है । ये लोग सम-रूप को 'पारिवारिक प्रेम के लिए ही उचित समझते है । ८. भक्ति का वास्तविक रूप—भक्तिकाल मे कृष्ण-भक्ति का जो आन्दो- लन चला वह दिनप्रति दिन इतना जोर पकडता गया कि राधा और कृष्ण मानस मानस मे रम गये । उनकी लीलाएँ सभी के मनो को आप्लावित करने लगी । रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियो ने कृष्ण भक्ति की इस प्रसिद्धि का लाभ उठाया और भक्तिकाल से अत्यन्त सुपरिचित राधा और कृष्ण को नायिका तथा नायक के रूप मे ग्रहण कर लिया और मन खोलकर इनके श्रृंगार का वर्णन किया । भक्तिकाल मे जो श्रृंगार अलौकिक माना जाता था, रीतिकाल में आकर वह अलौकिक और मासल बन गया । रीतिकालीन कवियो ने राधा और कृष्ण को अपनाया इसलिए था कि उनके काव्य मे प्रभावोत्पादकता तथा चमत्कार आ जाये । राधा-कृष्ण की भक्ति से उनका दूर का भी कोई सम्बन्ध नही है । एक रीतिकालीन कवि ने तो स्पष्ट ही कहा है— 'आगे के सुकवि रीझै है तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है ।' 'सुमिरन के बहाने मे' भक्ति की वास्तविकता कितनी होती है, यह बताने की आवश्यकता नही है । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवियो के हृदयो मे भक्ति की सच्ची एव स्वाभाविक भावना थी । ये लोग पहले भक्त थे और बाद में कवि । कविता इनके लिए साधन थी, रीतिबद्ध कवियो की भाँति साध्य नही । स्वच्छन्द धारा की इन प्रमुख विशेषताओ पर दृष्टिपात करने के पश्चात् अब इनके आधार पर रसखान के काव्य की समीक्षा करना आवश्यक है । रसखान और स्वच्छन्द मार्ग रसखान का काव्य भावो की मंजूषा है । जिधर भी देखिये, इनके काव्य मे भावो का अजस्र स्रोत प्रवाहित होता हुआ दृष्टिगोचर होता है । यदि ये भक्ति-परक भावो की अभिव्यजना करते है तो उसी हृदय से जो एक वास्त- विक भक्त का हृदय होता है । अपने आराध्य के प्रति पूर्ण विश्वास भक्त- हृदय की पूर्णतम विशेषता होती है । रसखान भी इसी विश्वास को धारण किये हुए है और कहते है कि कृष्ण जिसका रक्षक है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड सकता, यहाँ तक कि यमराज भी उसे कुछ हानि नही पहुँचा सकता—

१४८ रसखान-ग्रन्थावली 'द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो। गौतम गेहिनी कैसी तरी, प्रह्लाद की कैसे हर्यौ दुख भारो। काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो। ताखन जाखन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो॥' रसखान ने जिस विषय का भी प्रस्तुतीकरण किया है, उसी को अत्यन्त भावपूर्ण रीति से व्यक्त किया है। यथा- रूप-माधुरी- 'आवत हैं वन ते मनमोहन गाइन संग लसे ब्रज-ग्वाला। वेनु बजावत गावत गीत अभीत दूतै करिगो कछु स्याना। हेरत हेरि थकै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला। देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्यौस को ताप-रसाला॥' वक्र दृष्टि- 'आती लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना। गडनि पै छलकें छवि कुंडल मंडित कुंतल रूप की सैना।, दीरघ वक्र विलोकन की अवलोकनि चारति चित्त को चैना। मो रसखानि हर्यौ चित्त री मुसकाइ कहे अधरामृत बैना॥' मुसकान माधुरी- 'वा मुख की मुसकान भटू अँखियन ते नेकु टरै नहि टारी। जौ पलकें पल लागति हैं पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी। दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम, गह्यो वजमारी। प्रेम की वानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी॥' सौन्दर्य-वर्णन- 'मोरपखा सिर कानन कुंडल कुंतल सो छवि गडनि छाई। वक्र बिसाल रसाल विलोचन है दुख मोचन मोहन माई। आली नवीन महाघन सो तन पीत पटा ज्यौं छटा वनि आई। हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई॥'

समीक्षा भाग १४६ कुंजलीला-- 'कुंजगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ मटभेरो । माई री वा मुख की मुसकानि गयौ मन बूडि फिरै नहिं फेरो । जोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित्त डार्यौ है प्रेम को फद घनेरो । कैसी करौ अब क्यौ निकसौ रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।।' रसखान- काव्य मे कृत्रिम व्यापारो का अभाव है । वर्णन और चेष्टा दोनो मे ही स्वाभाविकता है । नटखट कृष्ण गोपियो से छेडछाड करते है । गोपियाँ कितनी स्वाभाविक भाषा मे उसकी भर्त्सना करती है— 'अन्त ते न आयौ याही गाँवरे को जायौ, माई वापरे जिवायौ प्याइ दूध वारे बारे को । सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै, लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को । मैया की सौ सोच कछु मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को । यहै दुख भारी गहै डगर हमारी माँझ, नगर हमारे ग्वल बगर हमारे को ।।' चेष्टाओ का भी रसखान ने स्वाभाविक वर्णन किया है । कृष्ण किसी गोपी को मार्ग मे ही घेर लेते है । उनकी आँखे चार होती है । तब कृष्ण अपना नटखटपना शुरू करते है । तब बेचारी विवश गोपी अपनी लज्जा बचाने के लिए अपने ही वस्त्रो मे इस प्रकार लिपट जाती है जैसे सावन के बादल मे छिपकर बिजली भीतर ही भीतर तडप रही हो— 'पहले दधि लै गई गोकुल मैं चख चारि भए नट नागर पै । रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दै दान खरे अरपै । नख ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कंपै डरपै । मनौ दामिनि सावन के घन मै निकसै नहीं भीतर ही तरपै ।।' वस्तुत. रसखान की दृष्टि मे प्रेम एक अत्यन्त उदात्त भाव है । इन उदात्त भावो से सम्वद्ध भावो मे कृत्रिप्रता लाना इसके औदात्य को नष्ट करना है । इसीलिए इन्होने सर्वत्र स्वाभाविकता का ध्यान रखा है । रसखान का काव्य भाव-प्रधान है । शब्दो का सचयन और संयोजन

१५० रसखान-ग्रन्थावली इतनी कुशलता से किया गया है कि सर्वत्र भावों की प्रवल धारा अपनी अबाध और सहज गति से प्रवाहित हो रही है। कोई गोपी अपनी सखी से अपने प्रेम को किस सरलता किन्तु भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है— 'काल्हि पढू मुरली-धुनि में रसखानि लियो कहुँ नाम हमारौ। ता दिन तैं भई बैरिन सास हितो कियो झांकन देति न द्वारौ।' होत चवाव बनाव सौ आनी री जौ भरि आंगिन भेंटियै प्यारौ।' बाट परी अब ही ठिठनयौ हियरे अटकायौ पियरे पटवारौ।' 'पियरे पटवारौ' में अनन्त भावों की गरिमा के साथ-साथ अपार आत्मी- यता सन्निहित है। 'दानलीला' में कृष्ण-राधा-संवाद के अन्तर्गत और भी अधिक भावप्रवणता दृष्टिगोचर होती है। यथा— कृष्ण— 'एरी कहा वृषभानुसुता कौ तौ दान दिये बिन जान न पैहौ। जौ दधि-माखन देव जू चाहन भूगत लाँघन या मग ऐहौ। नाहिं तौ जौ रस गौ रस लैहौ जु गोरस बेचन फेरि न जैहौ। नाहक नारि तू रारि बढ़ावति गारि दियैं फिरि आपहि दैहौ॥' राधा— 'गारी के देवैया बनवारी तुम कहौ कौन, हम तो वृषभान की कुमारी सब जानौ हौ। जोर तौ करोगे जाउ जामौ हरि पार पाहु, भुरही ते आजु मों सों कैसो हठ ठानौ है! बूझि देखौ मन माँहि अचंभत मग जात, बूझि हौ निदान कान्ह जोन कह्यो मानौ हौ। मेरे जान कोऊ मीरम्यान आवै दही छीनै, तू तो है अहीर मोहि नाहि पहिचानौ है।' आत्म-निवेदन भक्त की एक प्रमुख विशेषता होती है। इसके द्वारा भक्त अपने जीवन के सारे कार्यों का—विशेषतः पापों का—अनावरण अपने आराध्य के समक्ष कर देता है। इस अनावरण का कारण होता है अपने आराध्य के प्रति अगाध विश्वास। रसखान में सूर अथवा तुलसी जैसा आत्म-

समीक्षा भाग १५१ निवेदन तो नही मिलता, पर अपने आराध्य के प्रति इन्होने अगाध विश्वास अवश्य व्यक्त किया है । यथा- 'कहा करै रसखान का कोई चुगुल लबार । जो पै राखन हार है माखन चाखन हार ॥' इस प्रकार के अनेक उदाहरण रसखान-काव्य मे मिलते है । आत्म-समर्पण भी अगाध विश्वास का एक अग है । रसखान जिस विधि से स्वय को अपने भगवान के प्रति समर्पित करते है, वह विलक्षण है । इस विषय मे इनका निम्नलिखित सवैया बहुत प्रचलित है- 'मानुष हौ तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौ तौ कहा बस मेरो चरौ नित नद की धेनु मँझारन । पाहन हौ तौ वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरदर धारन । जो खग हौ तौ बसेरो करौ मिलि कालिदी-कुल-कदम्ब की डारन ॥' विरह-वेदना की अभिव्यक्ति भक्तो के लिए प्रमुख रही है । फारसी- साहित्य मे तो यही एकमात्र सोपान है जिससे प्रियतम अथवा आराध्यदेव तक पहुँचा जा सकता है । रसखान के विरह का अत्यन्त सजीव एव स्वाभाविक वर्णन किया है । यथा- 'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हियै जिन ढारौ । कज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ । एते इलाज बिकाज करौ रसखानि को काहे को जारे पै जारौ । चाहति हौ जु जिवायौ पटू तौ दिखावौ बड़ी-बड़ी अँखिनिवारौ ॥' प्रियतम के सान्निध्य के बिना विरहिणी की विरह-वेदना का और उपचार ही क्या हो सकता है । कही-कही परम्परा के अवाछित चक्कर मे आकर अथवा फारसी-प्रभाव के कारण रसखान ऊहात्मक वर्णन भी कर गये है । पर ऐसे स्थल कम ही है । वास्तविक काव्य-आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ है भी नही । रसखान किसी काव्य-शास्त्रीय नियम से न तो अवगत ही है और न यह विशेषता इनके लिए आवश्यक ही है । अपने भावावेश मे ही इनकी

१५२ रसखान-ग्रन्थावली वाणी फूटती है और वाणी का यही प्रस्फुटन सरस एवं सच्चे काव्य को जन्म देता है । अन्य स्वच्छन्दवादी कवियो की भाँति रसखान ने भी प्रेम के स्वस्थ रूप का चित्रण किया है । प्रेम इनकी दृष्टि मे हृदय की सबसे उदात्त भावना है । इनके मत से शुद्ध और वास्तविक प्रेम वही है जिसमे अकारण ही आकर्षण हो । गुण, यौवन, रूप आदि के आकर्षण से जो प्रेम होता है, उसे शुद्ध नही कहा जा सकता । पुत्र, कलत्र आदि के प्रति किया गया प्रेम भी स्वाभाविक और सच्चा नही है । वास्तव मे प्रेम भगवान का ही दूसरा रूप है । रसखान ने प्रेम का सागोपाग विवेचन किया है एतद्विषयक इनके दोहे 'प्रेम-वाटिका' में सगृहीत है । रसखान सच्चे हृदय से भक्त थे । रीतिकालीन कवियो की भाँति भक्ति का वहाना इन्होने नही लिया था । इसलिए इनके काव्य मे आद्योपांत कृष्ण- भक्ति की धारा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है । इनकी भक्ति साधना मे वे सभी विशेषताएँ मिलती है जो वैष्णव-भक्ति के लिए अनिवार्य हैं । अत कहा जा सकता है कि रसखान-काव्य मे वे सभी गुण विद्यमान हैं जो स्वच्छन्द काव्यधारा मे पनपे हैं । डा० मनोहरलाल गौड के शब्दो मे— '....रसखान मे अपने समय की-काव्य प्रवृत्तियो तथा अनुभूति-विधानों का परिचय तो दिखाई पडता है, पर अनुसरण नही । उन्होने अपना ही स्वानु- कूल मार्ग बनाया । उस मार्ग मे विशुद्ध अप्रतिहत प्रेम की अनुभूति का प्राचुर्य था और उसकी अनावृत्त अभिव्यक्ति थी जो स्वच्छन्द मार्ग की ओर सकेत करती है, शास्त्रीय परम्परा की ओर नही । इसका तात्पर्य यह तो कदापि नही कि रसखान ने जान-बूझकर शास्त्रीय मार्गों का सघटन किया है, या वे काव्य के स्वच्छन्द मार्ग से यथाविधि परिचित थे । उनके जीवन का सयोग मुसलमान प्रेमी भक्त होने के नाते विविध पद्धतियो के सम्मिश्रण का कारण बन गया था । वैसा ही सम्मिश्रण कबीर मे भी हुआ था, पर कबीर ज्ञानमार्गी होकर कठोर भी हो गये और खडन-परायण भी । हृदय की अनुभूतियो को अपने ढंग से व्यक्त करने की सरस प्रवृत्ति उनमे नही आई जो रसखान में आ गई ।'

सुजान-रस खान

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भक्ति-भावना सवैया मानुष हो तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पसु हौ तो कहा बसु मेरो चरौ नित नन्द की धेनु मंझारन । पाहन हौ तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौ तो बसेरो करौ मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।।१।। शब्दार्थ—मानुष हौ=यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले । मंझारन=मध्य मे । पाहन=पत्थर । छत्र=छाता । पुरन्दर=इन्द्र । धारन=गर्व नष्ट करने के लिए । कालिन्दी-कूल-कदम्ब=यमुना के तट पर खड़े हुए कदम्ब के वृक्ष जिन पर कृष्ण अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे । डारन=डालियो मे । अर्थ—कृष्ण के प्रति अपनी स्वतन्त्र भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति करते हुए रसखान कहते है कि यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले तो मैं वही मनुष्य बनूँ जिसे ब्रज और गोकुल गाँव के ग्वालो के साथ रहने का अवसर मिले । आगामी जन्म पर मेरा कोई बस नही है, ईश्वर जैसी योनि चाहेगा, दे देगा, इसलिए यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज या गोकुल मे ही हो, ताकि मुझे नित्य नन्द की गायो के मध्य मे विचरण करने का सौभाग्य प्राप्त हो सके । यदि मुझे पत्थर-योनि मिले तो मै उसी पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र का गर्व नष्ट करने के लिए अपने हाथ पर छाते की भाँति उठा लिया था । यदि मुझे पक्षी-योनि मिले तो मैं ब्रज मे ही जन्म पाऊँ ताकि मै यमुना के तट पर खडे हुए कदम्ब के वृक्ष की डालियो मे निवास कर सकूँ । विशेष—१ कवि ने अपना सम्बन्ध उन्ही वस्तुओ से जोडने की इच्छा प्रकट की है, जिनसे कृष्ण का सम्बन्ध रहा है । भक्त को चाहे जिस अवस्था मे रहना पड़े, उसे उसके आराध्यदेव के दर्शन नित्य मिलते रहे, यही उसके १५५

३५६ रसखान-ग्रन्थावली जीवन का लक्ष्य होता है । रसखान ने भी उपर्युक्त सवैये मे इस लक्ष्य की भावमयी अभिव्यञ्जना की है । २. 'बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन' मे तथा 'कालिन्दी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास अलकार है । ३. 'पाहन ही तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर-धारन' मे निम्नलिखित अन्तर्कथा निहित है— कृष्ण के आदेश से ब्रजवालो ने इन्द्र की पूजा छोडकर गौओ की पूजा करनी आरम्भ कर दी । इस बात से इन्द्र अत्यन्त कुपित हुआ । उसने ब्रज को डुवाने के लिए मूसलाधार वर्षा कर दी । कृष्ण ने ब्रज की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठाकर छाते की भाँति ब्रज के ऊपर लगा दिया । तब इन्द्र ब्रज का कुछ भी न बिगाड सका । उसका गर्व नष्ट हो गया । 'पाठान्तर—'मानुष हौं तो वही रसखानि बसो नित गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो ब्रज छत्र पुरन्दर-धारन । जौ खग हौं तौ बसेरो करौं वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।' तुलना—'ब्रज के लता पता मोहि कीजै ।' —हरिश्चन्द्र सवैया जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै कुज-कुटीरन देहु बुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि नहीं ब्रज-रेनुका-अंग-सवारन । खास निवास लियो जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ॥२॥ शब्दार्थ—रसना = जीभ । रस = इन्द्रियो को आनन्द देने वाले मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कपाय और तिक्त रस । नीकी = अच्छी । बुहारन = साफ करना, झाडू देना । रेनुका = धूल । कालिन्दी-कूल = यमुना का तट । अर्थ—रसखान अपने आराध्यदेव से प्रार्थना करते हुए कहते है कि हे देव, मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो, ताकि मेरी जीभ इन्द्रियो के आनन्द मे डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटियो मे झाडू लगाने दो,

व्याख्या भाग १५७. जिससे मेरे हाथ सत्कार्य करते रहे । मुझे ब्रज की धूल मे अपने शरीर को धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये । यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई स्थान देना चाहते है तो यमुना-तट पर खडे हुए उन्ही कदम्ब की डालियो मे दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे । विशेष—'जो रसना रसना विलसे' मे यमक तथा 'करै करनी,' 'कुज- कुटीरन', 'सिद्धि-समृद्धि' और 'कालिदी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास- अलकार है। सवैया 'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी । हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी । जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी । त्यौ रसखान वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।' शब्दार्थ—बैन = वाणी । सानी = युक्त । सरै = माला पहनाये । पाइ = पैर, चरण । अनुजानी = अनुगामी । जान = प्राण । रसखानी = अन्तिम पक्ति मे यह शब्द चार बार प्रयुक्त हुआ है, अत. इसके अर्थ क्रमश' ये है—(१) कवि का नाम, (२) आनन्द का भण्डार, (३) श्री कृष्ण, (४) प्रेम का खजाना, अर्थात् अत्यन्त प्रेम करने वाला । अर्थ—मनुष्य-जीवन की सफलता एव सार्थकता तभी है जब वह स्वयं को अपने आराध्य देव के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दे, इसी भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि वही वाणी सार्थक है जो कृष्ण के गुणो का गान करती है, वे ही कान सार्थक है जो कृष्ण की वाणी से युक्त रहते है, वे ही हाथ सार्थक है जो कृष्ण के शरीर पर माला पहनाते है; वे ही चरण सार्थक है जो कृष्ण का अनुगमन करते है, उनके पीछे-पीछे चलते है, वे ही प्राण सार्थक है जो सदैव कृष्ण के साथ रहते है; वही मान सार्थक है जो कृष्ण को द्रवित करके उनसे मनमानी बात करा लेता है । इसी प्रकार वही आनन्द के भण्डार श्री कृष्ण है जो अपने भक्तो को अत्यन्त प्यार करते है । विशेष—इस सवैया की अन्तिम पक्ति मे यमक अलकार का अत्यन्त चमत्कारपूर्ण एव भावपूर्ण प्रयोग है ।

१५८ रसखान ग्रन्थावली दोहा कहा करै रसखानि को, कोऊ चुगुल लवार । जो पै राखनहार है, माखन चाखनहार ॥४॥ शब्दार्थ—चुगुल = चुगलखोर । लवार = झूठा, दुष्ट । राखनहार = रक्षक । माखनमाखनहार = श्रीकृष्ण । अर्थ—श्रीकृष्ण जिसके रक्षक हैं, उनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता, इस भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते हैं कि यदि श्रीकृष्ण मेरे रक्षक हैं तो मेरा कोई भी चुगलखोर तथा दुष्ट व्यक्ति कुछ नही बिगाड़ सकता । विशेष— १. 'जो पै राखनहार है, माखन-चाखनहार' मे यमक अलकार है । २. कहते हैं कि बादशाह अकबर ने रसखान को दीने-इलाही में दीक्षित होने के लिए कहा, किन्तु ये दीने-इलाही में सम्मिलित न होकर कृष्ण-भक्त बन गये । तब किसी व्यक्ति ने बादशाह से आकर इनकी चुगली की और इन्हे कठोर दण्ड देने का परा- मर्श दिया । इस घटना की प्रतिक्रिया-स्वरूप रसखान ने उपर्युक्त दोहे की रचना की । पाठान्तर—कहा करै रसखान को, लपट लोग लवार । जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥ तुलना—१. 'जो प राखि है राम तो मारि है कोरे ।' —तुलसीदास २. रहिमन को कोउ का करै, ज्वारी चोर लवार । जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥ —रहीम दोहा विमल सरल रसखानि, भई सकल रसखानि ॥ सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥५॥ शब्दार्थ—विमल = शुद्ध । रसखानि मिलि = कृष्ण से मिलकर । रसखानि = कृष्ण ।

ऽव्याख्या भाग १५६ अर्थ—रसखान कवि कहते हैं कि शुद्ध एव सरल स्वभाव वाली गोपियाँ जिस कृष्ण से मिलकर उसी का रूप बन गई, मेरा मन उसी दयालु रसखान (आनन्द-सागर कृष्ण) का घातक बना हुआ है। विशेष— १. यमक अलकार । २. चातक का प्रेम आदर्श प्रेम माना गया है, अतः अपने प्रेम की अभिव्यक्ति सभी भक्त-कवियो ने चातक के माध्यम से ही की है। गोस्वामी तुलसीदास ने तो चातक प्रेम का सागोपाग ही वर्णन किया है। दोहा सरस नेह लवलीन नव, द्वै सुजान रसखानि। ताके आस बिसास सो पगे प्रान रसखानि ॥६॥ शब्दार्थ—नेह = प्रेम। लवलीन = तन्मय। नव = नूतन। द्वै = दोनो, कृष्ण और राधा। अर्थ—कवि कृष्ण और राधा के मिलन की स्तुति करता हुआ कहता है कि जो राधा और कृष्ण के सरस तथा नूतन प्रेम मे तन्मय हैं, उन्ही की दया की आशा और विश्वास से मेरे प्राण सदैव सम्पृक्त है। कृष्ण का अलौकिकत्व सवैया ऽसकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै। नैक हिये जिहि आनत ही जड मूढ महा रसखानि कहावै। जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावै। ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥७॥ शब्दार्थ—सकर से सुर = शिव जैसे देव। चतुरानन = ब्रह्मा। नैक = थोडा-सा। आनत ही = लाते ही। जड़ मूढ = अत्यन्त मूर्ख। महा रसखानि = विपुल ज्ञान के भंडार। अदेव = किन्नर। भू-अगना = पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ। वारत प्रानन = प्राणो को न्यौछावर करके। अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस कृष्ण का जप शकर जैसे देव करते हैं, जिनका

१६० रसखान-ग्रन्थावली

ध्यान करके वह्मा अपने धर्म मे वृद्धि करते है, जिसका तनिक सा ध्यान भी हृदय मे लाते ही अत्यन्त मूर्ख भी विपुल ज्ञान के भडार बन जाते है, जिस पर देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करके सजीवता प्राप्त करती है, उसी कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—'सकर से सुर', 'ध्यानान धर्म', 'छोहरिया छछिया भरि छाछ' मे छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास, 'नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ महा रसखानि कहावै' मे द्वितीय विभावना, 'वारत प्रानन प्रानन पावै'मे विरोधाभास और जापर देव अदेव भू-अगना' मे यमक अलकार है । पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्तित के निम्नलिखित पाठांतर मिलते है— १. जापर सुन्दर देववधू नहिं वारत प्रान अवार लगावै । २. जापर देव भुवंग वरगना वारति प्रान सु प्रान से पावै । ३. जापर देव अदेव भुवंगम वारत प्रानन पार न पावै । सवैया सेप गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावै । जाहि अनादि अनंत अखण्ड अछेद अभेद सु वेद बतावै । नारद से सुक व्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥८॥ शब्दार्थ—सेष=शेषनाग । महेस=शिव । दिनेस=सूर्य ! सुरेस=इन्द्र । अछेद=अच्छेद्य, अमर । अभेद=अभेद्य, जिसका रहस्य न जाना जा सके । पचि=कोशिश करके । अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते हे कि जिस कृष्ण के गुणो का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र निरन्तर स्मरण करते है । वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त न करके उसे अनादि, अनन्त, अखण्ड, अच्छेद्य, अभेद्य आदि विशेषणो से युक्त करते है । नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रकाड पडित भी अपनी पूरी कोशिश करके जिसके स्वरूप का पता न लगा सके और हार मानकर बैठ गए, उन्ही कृष्ण को,

व्याख्या भाग १६१ अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—श्रुत्यनुप्रास, छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग हुआ है । सवैया गावै गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेष सबै गुन गावत । नाम अनत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत । जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत ॥६॥ शब्दार्थ—गनिका = अप्सरा । गंधरब्ब = गंधर्व, संगीत-प्रिय देवयोनि । सारद = शारदा । सेष = शेषनाग । त्रिलोचन = शिव । छोहरियाँ = लड़की । छछिया = मिट्टी का छोटा-सा पात्र । अर्थ—कृष्ण की भवत-वत्सलता एव लोक-लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जिस कृष्ण के गुणो का गान अप्सरा, गंधर्व, शारदा और शेषनाग सभी करते है, गणेश जिसके अनत नामो का स्मरण करते है, ब्रह्मा और शिव जिसके रहस्य को नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिए योगी, यति, तपस्वी और सिद्ध निरन्तर समाधि लगाये रहते है, फिर भी उसका भेद नही जान पाते, उन्ही कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—इस सवैया मे छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग है । पाठान्तर—'गावत', 'पावत', 'लगावत' और 'नचावत' के स्थान पर क्रमशः 'गावै', 'पावै,' 'लगावै', ओर 'नचावै' पाठ भी मिलते है । सवैया लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक योगी भये पर अन्त न पावै । साँझ ते भोरहि भोर ते साझति सेस सदा नित नाम जपावै । ढूंढ़ फिरे तिरलोक मे साख सुनारद लै कर बीन बजावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछियां भर छाछ पै नाच नचावै ॥१०॥ शब्दार्थ—भोर = प्रात काल । साँझ ते भोरहि भोर ते साझहि = सन्ध्या- काल से प्रात काल तक और प्रात काल से सन्ध्याकाल तक; अर्थात् हर समय,