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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१४६ रसखान-ग्रन्थावली ५. विरह-वदना--इन कवियो ने प्रेम की हृदयगम्य अभिव्यक्ति की है और इनका प्रेम लौकिक से अलौकिक बना है, अत. इनमे प्रेम के विरह पक्ष की वास्तविकता मिलती है । ये कवि जिस प्रकार सयोग-वर्णन मे अन्तर्मुख रहते है और उसी प्रकार वियोग वर्णन मे भी रहते हैं । बल्कि वियोग वर्णन में इनकी अन्तर्मुखता और भी अधिक बढ जाती है । इसीलिए इनके विरह-वर्णन मे जो स्वाभाविकता और मार्मिकता है, वह रीतिबद्ध कवियों के काव्यो मे नही मिलती । विरह के प्राय सभी पक्षो को लेकर ये कवि चले हैं । इनमें विरह-वेदना की इतनी प्रधानता है कि सयोग मे भी ये लोग एक प्रकार का वियोग-सा ही देखते है । अत इन्हे न तो सयोग मे शान्ति है और न वियोग मे । इनका विरह-वर्णन अन्तर्मुखी है, रीतिबद्ध कवियो की भाँति बहिर्मुखी और मासल नही । ६. आत्मानुभूति--रीतिमुक्त कवियो ने सदैव हृदय को प्रधानता दी, फलतः इनके काव्यो मे अत्मानुभूति का अंश पर्याप्त मात्रा मे पाया जाता है । रीति- बद्ध कवियो की भाँति बुद्धि के बल पर, इन्होने दूर की कौड़ी लाने का कभी प्रयत्न नही किया, जिन भावो से इनका परिचय था और जो भाव इनके हृदय की सीमा मे सहज स्वाभाविक रूप से आ सकते थे, उन्हे ही इन कवियो ने अपनाया और उन्ही की अभिव्यक्ति की । इसीलिए इन कवियो के काव्यो में आत्मानुभूति का पक्ष प्रबल है । ७ प्रेम का स्वस्थ रूप--रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियो ने लौकिक श्रृंगार को महत्ता दी और अथ से इति तक उसी का वर्णन किया । फलतः उनके काव्य मे प्रेम का मासल रूप ही सुरक्षित रह गया । प्रेम-भाव के जो अन्य सूक्ष्म एव उदात्त अंग होते हैं, उनकी ओर न तो इन कवियो ने कोई ध्यान ही दिया और न ऐसा करना इनके लिए आवश्यक था । अत. प्रेम इनकी दृष्टि मे एक प्रकार का प्रमुखतम काम-भाव ही बनकर रह गया । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवियो ने प्रेम को हृदय के एक उदात्त भाव के रूप मे ग्रहण किया और इसकी स्वस्थता का आद्योपात वर्णन किया । इनकी दृष्टि मे प्रेम का पथ ही एक ऐसा पथ है जो परमात्मा तक आत्मा को ले जाने मे समर्थ है । एक बात और, रीतिबद्ध कवियो ने प्रेम के सम-रूप पर जोर दिया है और रीतिमुक्त कवियो ने विषम-रूप पर । इनकी दृष्टि से, स्वच्छन्द प्रेम