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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १४७

का चरम् उत्कर्ष विषमता मे ही निष्पन्न होता है । ये लोग सम-रूप को 'पारिवारिक प्रेम के लिए ही उचित समझते है । ८. भक्ति का वास्तविक रूप—भक्तिकाल मे कृष्ण-भक्ति का जो आन्दो- लन चला वह दिनप्रति दिन इतना जोर पकडता गया कि राधा और कृष्ण मानस मानस मे रम गये । उनकी लीलाएँ सभी के मनो को आप्लावित करने लगी । रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियो ने कृष्ण भक्ति की इस प्रसिद्धि का लाभ उठाया और भक्तिकाल से अत्यन्त सुपरिचित राधा और कृष्ण को नायिका तथा नायक के रूप मे ग्रहण कर लिया और मन खोलकर इनके श्रृंगार का वर्णन किया । भक्तिकाल मे जो श्रृंगार अलौकिक माना जाता था, रीतिकाल में आकर वह अलौकिक और मासल बन गया । रीतिकालीन कवियो ने राधा और कृष्ण को अपनाया इसलिए था कि उनके काव्य मे प्रभावोत्पादकता तथा चमत्कार आ जाये । राधा-कृष्ण की भक्ति से उनका दूर का भी कोई सम्बन्ध नही है । एक रीतिकालीन कवि ने तो स्पष्ट ही कहा है— 'आगे के सुकवि रीझै है तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है ।' 'सुमिरन के बहाने मे' भक्ति की वास्तविकता कितनी होती है, यह बताने की आवश्यकता नही है । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवियो के हृदयो मे भक्ति की सच्ची एव स्वाभाविक भावना थी । ये लोग पहले भक्त थे और बाद में कवि । कविता इनके लिए साधन थी, रीतिबद्ध कवियो की भाँति साध्य नही । स्वच्छन्द धारा की इन प्रमुख विशेषताओ पर दृष्टिपात करने के पश्चात् अब इनके आधार पर रसखान के काव्य की समीक्षा करना आवश्यक है । रसखान और स्वच्छन्द मार्ग रसखान का काव्य भावो की मंजूषा है । जिधर भी देखिये, इनके काव्य मे भावो का अजस्र स्रोत प्रवाहित होता हुआ दृष्टिगोचर होता है । यदि ये भक्ति-परक भावो की अभिव्यजना करते है तो उसी हृदय से जो एक वास्त- विक भक्त का हृदय होता है । अपने आराध्य के प्रति पूर्ण विश्वास भक्त- हृदय की पूर्णतम विशेषता होती है । रसखान भी इसी विश्वास को धारण किये हुए है और कहते है कि कृष्ण जिसका रक्षक है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड सकता, यहाँ तक कि यमराज भी उसे कुछ हानि नही पहुँचा सकता—