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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१४८ रसखान-ग्रन्थावली 'द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो। गौतम गेहिनी कैसी तरी, प्रह्लाद की कैसे हर्यौ दुख भारो। काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो। ताखन जाखन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो॥' रसखान ने जिस विषय का भी प्रस्तुतीकरण किया है, उसी को अत्यन्त भावपूर्ण रीति से व्यक्त किया है। यथा- रूप-माधुरी- 'आवत हैं वन ते मनमोहन गाइन संग लसे ब्रज-ग्वाला। वेनु बजावत गावत गीत अभीत दूतै करिगो कछु स्याना। हेरत हेरि थकै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला। देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्यौस को ताप-रसाला॥' वक्र दृष्टि- 'आती लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना। गडनि पै छलकें छवि कुंडल मंडित कुंतल रूप की सैना।, दीरघ वक्र विलोकन की अवलोकनि चारति चित्त को चैना। मो रसखानि हर्यौ चित्त री मुसकाइ कहे अधरामृत बैना॥' मुसकान माधुरी- 'वा मुख की मुसकान भटू अँखियन ते नेकु टरै नहि टारी। जौ पलकें पल लागति हैं पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी। दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम, गह्यो वजमारी। प्रेम की वानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी॥' सौन्दर्य-वर्णन- 'मोरपखा सिर कानन कुंडल कुंतल सो छवि गडनि छाई। वक्र बिसाल रसाल विलोचन है दुख मोचन मोहन माई। आली नवीन महाघन सो तन पीत पटा ज्यौं छटा वनि आई। हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई॥'