रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १४६ कुंजलीला-- 'कुंजगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ मटभेरो । माई री वा मुख की मुसकानि गयौ मन बूडि फिरै नहिं फेरो । जोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित्त डार्यौ है प्रेम को फद घनेरो । कैसी करौ अब क्यौ निकसौ रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।।' रसखान- काव्य मे कृत्रिम व्यापारो का अभाव है । वर्णन और चेष्टा दोनो मे ही स्वाभाविकता है । नटखट कृष्ण गोपियो से छेडछाड करते है । गोपियाँ कितनी स्वाभाविक भाषा मे उसकी भर्त्सना करती है— 'अन्त ते न आयौ याही गाँवरे को जायौ, माई वापरे जिवायौ प्याइ दूध वारे बारे को । सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै, लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को । मैया की सौ सोच कछु मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को । यहै दुख भारी गहै डगर हमारी माँझ, नगर हमारे ग्वल बगर हमारे को ।।' चेष्टाओ का भी रसखान ने स्वाभाविक वर्णन किया है । कृष्ण किसी गोपी को मार्ग मे ही घेर लेते है । उनकी आँखे चार होती है । तब कृष्ण अपना नटखटपना शुरू करते है । तब बेचारी विवश गोपी अपनी लज्जा बचाने के लिए अपने ही वस्त्रो मे इस प्रकार लिपट जाती है जैसे सावन के बादल मे छिपकर बिजली भीतर ही भीतर तडप रही हो— 'पहले दधि लै गई गोकुल मैं चख चारि भए नट नागर पै । रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दै दान खरे अरपै । नख ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कंपै डरपै । मनौ दामिनि सावन के घन मै निकसै नहीं भीतर ही तरपै ।।' वस्तुत. रसखान की दृष्टि मे प्रेम एक अत्यन्त उदात्त भाव है । इन उदात्त भावो से सम्वद्ध भावो मे कृत्रिप्रता लाना इसके औदात्य को नष्ट करना है । इसीलिए इन्होने सर्वत्र स्वाभाविकता का ध्यान रखा है । रसखान का काव्य भाव-प्रधान है । शब्दो का सचयन और संयोजन