रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० रसखान-ग्रन्थावली इतनी कुशलता से किया गया है कि सर्वत्र भावों की प्रवल धारा अपनी अबाध और सहज गति से प्रवाहित हो रही है। कोई गोपी अपनी सखी से अपने प्रेम को किस सरलता किन्तु भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है— 'काल्हि पढू मुरली-धुनि में रसखानि लियो कहुँ नाम हमारौ। ता दिन तैं भई बैरिन सास हितो कियो झांकन देति न द्वारौ।' होत चवाव बनाव सौ आनी री जौ भरि आंगिन भेंटियै प्यारौ।' बाट परी अब ही ठिठनयौ हियरे अटकायौ पियरे पटवारौ।' 'पियरे पटवारौ' में अनन्त भावों की गरिमा के साथ-साथ अपार आत्मी- यता सन्निहित है। 'दानलीला' में कृष्ण-राधा-संवाद के अन्तर्गत और भी अधिक भावप्रवणता दृष्टिगोचर होती है। यथा— कृष्ण— 'एरी कहा वृषभानुसुता कौ तौ दान दिये बिन जान न पैहौ। जौ दधि-माखन देव जू चाहन भूगत लाँघन या मग ऐहौ। नाहिं तौ जौ रस गौ रस लैहौ जु गोरस बेचन फेरि न जैहौ। नाहक नारि तू रारि बढ़ावति गारि दियैं फिरि आपहि दैहौ॥' राधा— 'गारी के देवैया बनवारी तुम कहौ कौन, हम तो वृषभान की कुमारी सब जानौ हौ। जोर तौ करोगे जाउ जामौ हरि पार पाहु, भुरही ते आजु मों सों कैसो हठ ठानौ है! बूझि देखौ मन माँहि अचंभत मग जात, बूझि हौ निदान कान्ह जोन कह्यो मानौ हौ। मेरे जान कोऊ मीरम्यान आवै दही छीनै, तू तो है अहीर मोहि नाहि पहिचानौ है।' आत्म-निवेदन भक्त की एक प्रमुख विशेषता होती है। इसके द्वारा भक्त अपने जीवन के सारे कार्यों का—विशेषतः पापों का—अनावरण अपने आराध्य के समक्ष कर देता है। इस अनावरण का कारण होता है अपने आराध्य के प्रति अगाध विश्वास। रसखान में सूर अथवा तुलसी जैसा आत्म-