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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १५१ निवेदन तो नही मिलता, पर अपने आराध्य के प्रति इन्होने अगाध विश्वास अवश्य व्यक्त किया है । यथा- 'कहा करै रसखान का कोई चुगुल लबार । जो पै राखन हार है माखन चाखन हार ॥' इस प्रकार के अनेक उदाहरण रसखान-काव्य मे मिलते है । आत्म-समर्पण भी अगाध विश्वास का एक अग है । रसखान जिस विधि से स्वय को अपने भगवान के प्रति समर्पित करते है, वह विलक्षण है । इस विषय मे इनका निम्नलिखित सवैया बहुत प्रचलित है- 'मानुष हौ तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौ तौ कहा बस मेरो चरौ नित नद की धेनु मँझारन । पाहन हौ तौ वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरदर धारन । जो खग हौ तौ बसेरो करौ मिलि कालिदी-कुल-कदम्ब की डारन ॥' विरह-वेदना की अभिव्यक्ति भक्तो के लिए प्रमुख रही है । फारसी- साहित्य मे तो यही एकमात्र सोपान है जिससे प्रियतम अथवा आराध्यदेव तक पहुँचा जा सकता है । रसखान के विरह का अत्यन्त सजीव एव स्वाभाविक वर्णन किया है । यथा- 'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हियै जिन ढारौ । कज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ । एते इलाज बिकाज करौ रसखानि को काहे को जारे पै जारौ । चाहति हौ जु जिवायौ पटू तौ दिखावौ बड़ी-बड़ी अँखिनिवारौ ॥' प्रियतम के सान्निध्य के बिना विरहिणी की विरह-वेदना का और उपचार ही क्या हो सकता है । कही-कही परम्परा के अवाछित चक्कर मे आकर अथवा फारसी-प्रभाव के कारण रसखान ऊहात्मक वर्णन भी कर गये है । पर ऐसे स्थल कम ही है । वास्तविक काव्य-आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ है भी नही । रसखान किसी काव्य-शास्त्रीय नियम से न तो अवगत ही है और न यह विशेषता इनके लिए आवश्यक ही है । अपने भावावेश मे ही इनकी