रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १४५ 'लोग है लाग कवित्त बनावत मोही तो मेरे कवित्त बनावत ।' यही कारण है कि रीति बद्ध कवियो की अपेक्षा रीति मुक्त कवियो के काव्यो मे अधिक भावप्रवणता है । २. कृत्रिम व्यापारो का त्याग—रीतिमुक्त कवियो का काव्य भावनापूर्ण था, अत इसमे अभिव्यक्ति व कृत्रिम व्यापारो का त्याग स्वाभाविक ही था । इन कवियो ने न तो श्रम करके शब्दो की योजना की है और न भाषा के रूप को सँवारा है । इनकी भाषा सहज और स्वाभाविक है । उसमे कही भी कृत्रि- मता दृष्टिगोचर नही होती । अलकार और लोकोक्तियाँ आदि के प्रयोग भी स्वाभाविक होने के कारण भावाभिव्यक्ति मे पूर्णत सहायक हुए है । इनके अतिरिक्त विषयो की कृत्रिमता भी इन कवियो को ईप्सित नही थी । बाह्य कृत्रिमताओ को सोचना और उनका वर्णन करना इन कवियो को न तो रुचता था और न वे इस ओर ध्यान ही देते थे । ये उन व्यापारो के प्रदर्शन की चेष्टाओ को भी निरर्थक मानते थे । यही कारण है कि स्वच्छन्द- धारा के कवियो मे विरह और मिलन दोनों मे प्रेमियो के हृदय के आन्तरिक पक्षो को उद्घाटित करने की होड सी लगी रही है । ३. भावो की प्रधानता—इन कवियो के काव्यो मे भावो की प्रधानता है । भाव-प्रधान होने के कारण इनके काव्यो मे चिन्तन-पथ दुर्बल है । रीतिबद्ध कवि बुद्धि के बल से ही भावो का अनुमान करते थे और बुद्धि के बल से ही प्रेम के बाह्य रूप का विधान करते थे । रीतिमुक्त कवि हृदय को ही प्रधान मानते थे और अपने समूचे काव्य की रचना हृदय की प्रेरणा के आधार पर ही करते थे । ४. आत्म-निवेदन—अपने भावो को अभिव्यक्ति मे ये कवि इतने निर्भीक है कि जो कुछ कहना चाहते है, स्पष्ट कह देते है । किसी अन्य माध्यम का सहारा नही लेते । रीतिबद्ध कवि अपनी प्रेमाभिव्यजना के लिए, सामाजिक भय के कारण जिन आवरणो को लपेटते चलते है, उनका इन कवियो के काव्यो मे एकदम अभाव है । साथ ही इन कवियो मे भक्ति की सच्ची एव वास्तविक अनुभूति थी, अत अपने आराध्य के समक्ष अपना हृदय खोलकर रख देने की इनमे क्षमता है ।