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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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: ११ : स्वच्छन्दधारा और रसखान रीतिकाल मे दो धाराएँ प्रमुख थी—रीतिबद्ध धारा और रीति-मुक्तधारा रीतिबद्ध धारा के कवि और आचार्य परम्परा के निर्वाह मे सदैव सतर्क और जागरूक रहते थे । भावो की अपेक्षा वे परम्परा तथा काव्य शास्त्रीय नियमों को प्राथमिकता देते थे। रीतिमुक्तधारा के कवियो के आदर्श रीतिबद्धधारा के कवियो के आदर्शों के बिल्कुल विपरीत थे। वे काव्यशास्त्रीय नियमो तथा परम्परा की अपेक्षा भावो को अधिक महत्व देते थे। इसीलिए इस धारा को स्वच्छन्दधारा भी कहा जाता है। इस धारा की निम्नलिखित विशेषताएँ है— १. भावावेश का प्राधान्य २ कृत्रिम व्यापारो का त्याग ३. भावो की प्रधानता ४ आत्म-निवेदन ५. विरह-वेदना ६. आत्मानुभूति ७. प्रेम का स्वस्थ निरूपण ८ भक्ति का वास्तविक रूप १ भावावेश का प्राधान्य—रीतिबद्ध और रीतिमुक्त कवियों के काव्य- रचना के प्रयोजनो मे आकाश-पाताल का अन्तर था। रीतिबद्ध कवि केवल दो प्रयोजनो से काव्य-रचना किया करते थे—आश्रयदाता का मनोरजन और पांडित्य-प्रदर्शन । इसलिए इनके काव्य प्राय श्रमसाध्य होते थे । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवि भावावेश के कारण ही काव्य-रचना करते थे । इस विषय की ओर संकेत करते हुए घनानन्द ने लिखा है— १४४