रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ
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समीक्षा भाग १४३ २. नाहिं उपजैगो बाँस नाहि बाजै फेर बाँसुरी' ३. 'छोरा जायो कि मेव मँगायो' ४. 'नेम कहा जब प्रेम कियो' इस विवेचन के उपरान्त यह कहना अनुचित नही कि रसखान की भाषा सभी दृष्टियो से सफल एव सार्थक है। एक विशिष्ट भाषा मे जिन गुणो की अपेक्षा होती है, वे सब रसखान की भाषा मे मिलते है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दो मे— 'इनकी (रसखान की) भाषा बहुत चलती, सरल और शब्दाडम्बर मुक्त होती थी। शुद्ध ब्रजभाषा का जो चलतापन और सफाई रसखान और घनानंद की रचनाओ मे है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।'