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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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भक्ति-भावना सवैया मानुष हो तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पसु हौ तो कहा बसु मेरो चरौ नित नन्द की धेनु मंझारन । पाहन हौ तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौ तो बसेरो करौ मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।।१।। शब्दार्थ—मानुष हौ=यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले । मंझारन=मध्य मे । पाहन=पत्थर । छत्र=छाता । पुरन्दर=इन्द्र । धारन=गर्व नष्ट करने के लिए । कालिन्दी-कूल-कदम्ब=यमुना के तट पर खड़े हुए कदम्ब के वृक्ष जिन पर कृष्ण अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे । डारन=डालियो मे । अर्थ—कृष्ण के प्रति अपनी स्वतन्त्र भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति करते हुए रसखान कहते है कि यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले तो मैं वही मनुष्य बनूँ जिसे ब्रज और गोकुल गाँव के ग्वालो के साथ रहने का अवसर मिले । आगामी जन्म पर मेरा कोई बस नही है, ईश्वर जैसी योनि चाहेगा, दे देगा, इसलिए यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज या गोकुल मे ही हो, ताकि मुझे नित्य नन्द की गायो के मध्य मे विचरण करने का सौभाग्य प्राप्त हो सके । यदि मुझे पत्थर-योनि मिले तो मै उसी पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र का गर्व नष्ट करने के लिए अपने हाथ पर छाते की भाँति उठा लिया था । यदि मुझे पक्षी-योनि मिले तो मैं ब्रज मे ही जन्म पाऊँ ताकि मै यमुना के तट पर खडे हुए कदम्ब के वृक्ष की डालियो मे निवास कर सकूँ । विशेष—१ कवि ने अपना सम्बन्ध उन्ही वस्तुओ से जोडने की इच्छा प्रकट की है, जिनसे कृष्ण का सम्बन्ध रहा है । भक्त को चाहे जिस अवस्था मे रहना पड़े, उसे उसके आराध्यदेव के दर्शन नित्य मिलते रहे, यही उसके १५५