रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ रसखान-ग्रन्थावली जीवन का लक्ष्य होता है । रसखान ने भी उपर्युक्त सवैये मे इस लक्ष्य की भावमयी अभिव्यञ्जना की है । २. 'बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन' मे तथा 'कालिन्दी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास अलकार है । ३. 'पाहन ही तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर-धारन' मे निम्नलिखित अन्तर्कथा निहित है— कृष्ण के आदेश से ब्रजवालो ने इन्द्र की पूजा छोडकर गौओ की पूजा करनी आरम्भ कर दी । इस बात से इन्द्र अत्यन्त कुपित हुआ । उसने ब्रज को डुवाने के लिए मूसलाधार वर्षा कर दी । कृष्ण ने ब्रज की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठाकर छाते की भाँति ब्रज के ऊपर लगा दिया । तब इन्द्र ब्रज का कुछ भी न बिगाड सका । उसका गर्व नष्ट हो गया । 'पाठान्तर—'मानुष हौं तो वही रसखानि बसो नित गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो ब्रज छत्र पुरन्दर-धारन । जौ खग हौं तौ बसेरो करौं वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।' तुलना—'ब्रज के लता पता मोहि कीजै ।' —हरिश्चन्द्र सवैया जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै कुज-कुटीरन देहु बुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि नहीं ब्रज-रेनुका-अंग-सवारन । खास निवास लियो जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ॥२॥ शब्दार्थ—रसना = जीभ । रस = इन्द्रियो को आनन्द देने वाले मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कपाय और तिक्त रस । नीकी = अच्छी । बुहारन = साफ करना, झाडू देना । रेनुका = धूल । कालिन्दी-कूल = यमुना का तट । अर्थ—रसखान अपने आराध्यदेव से प्रार्थना करते हुए कहते है कि हे देव, मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो, ताकि मेरी जीभ इन्द्रियो के आनन्द मे डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटियो मे झाडू लगाने दो,