भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

व्याख्या भाग १५७. जिससे मेरे हाथ सत्कार्य करते रहे । मुझे ब्रज की धूल मे अपने शरीर को धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये । यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई स्थान देना चाहते है तो यमुना-तट पर खडे हुए उन्ही कदम्ब की डालियो मे दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे । विशेष—'जो रसना रसना विलसे' मे यमक तथा 'करै करनी,' 'कुज- कुटीरन', 'सिद्धि-समृद्धि' और 'कालिदी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास- अलकार है। सवैया 'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी । हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी । जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी । त्यौ रसखान वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।' शब्दार्थ—बैन = वाणी । सानी = युक्त । सरै = माला पहनाये । पाइ = पैर, चरण । अनुजानी = अनुगामी । जान = प्राण । रसखानी = अन्तिम पक्ति मे यह शब्द चार बार प्रयुक्त हुआ है, अत. इसके अर्थ क्रमश' ये है—(१) कवि का नाम, (२) आनन्द का भण्डार, (३) श्री कृष्ण, (४) प्रेम का खजाना, अर्थात् अत्यन्त प्रेम करने वाला । अर्थ—मनुष्य-जीवन की सफलता एव सार्थकता तभी है जब वह स्वयं को अपने आराध्य देव के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दे, इसी भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि वही वाणी सार्थक है जो कृष्ण के गुणो का गान करती है, वे ही कान सार्थक है जो कृष्ण की वाणी से युक्त रहते है, वे ही हाथ सार्थक है जो कृष्ण के शरीर पर माला पहनाते है; वे ही चरण सार्थक है जो कृष्ण का अनुगमन करते है, उनके पीछे-पीछे चलते है, वे ही प्राण सार्थक है जो सदैव कृष्ण के साथ रहते है; वही मान सार्थक है जो कृष्ण को द्रवित करके उनसे मनमानी बात करा लेता है । इसी प्रकार वही आनन्द के भण्डार श्री कृष्ण है जो अपने भक्तो को अत्यन्त प्यार करते है । विशेष—इस सवैया की अन्तिम पक्ति मे यमक अलकार का अत्यन्त चमत्कारपूर्ण एव भावपूर्ण प्रयोग है ।