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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१६० रसखान-ग्रन्थावली

ध्यान करके वह्मा अपने धर्म मे वृद्धि करते है, जिसका तनिक सा ध्यान भी हृदय मे लाते ही अत्यन्त मूर्ख भी विपुल ज्ञान के भडार बन जाते है, जिस पर देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करके सजीवता प्राप्त करती है, उसी कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—'सकर से सुर', 'ध्यानान धर्म', 'छोहरिया छछिया भरि छाछ' मे छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास, 'नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ महा रसखानि कहावै' मे द्वितीय विभावना, 'वारत प्रानन प्रानन पावै'मे विरोधाभास और जापर देव अदेव भू-अगना' मे यमक अलकार है । पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्तित के निम्नलिखित पाठांतर मिलते है— १. जापर सुन्दर देववधू नहिं वारत प्रान अवार लगावै । २. जापर देव भुवंग वरगना वारति प्रान सु प्रान से पावै । ३. जापर देव अदेव भुवंगम वारत प्रानन पार न पावै । सवैया सेप गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावै । जाहि अनादि अनंत अखण्ड अछेद अभेद सु वेद बतावै । नारद से सुक व्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥८॥ शब्दार्थ—सेष=शेषनाग । महेस=शिव । दिनेस=सूर्य ! सुरेस=इन्द्र । अछेद=अच्छेद्य, अमर । अभेद=अभेद्य, जिसका रहस्य न जाना जा सके । पचि=कोशिश करके । अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते हे कि जिस कृष्ण के गुणो का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र निरन्तर स्मरण करते है । वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त न करके उसे अनादि, अनन्त, अखण्ड, अच्छेद्य, अभेद्य आदि विशेषणो से युक्त करते है । नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रकाड पडित भी अपनी पूरी कोशिश करके जिसके स्वरूप का पता न लगा सके और हार मानकर बैठ गए, उन्ही कृष्ण को,

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