रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽव्याख्या भाग १५६ अर्थ—रसखान कवि कहते हैं कि शुद्ध एव सरल स्वभाव वाली गोपियाँ जिस कृष्ण से मिलकर उसी का रूप बन गई, मेरा मन उसी दयालु रसखान (आनन्द-सागर कृष्ण) का घातक बना हुआ है। विशेष— १. यमक अलकार । २. चातक का प्रेम आदर्श प्रेम माना गया है, अतः अपने प्रेम की अभिव्यक्ति सभी भक्त-कवियो ने चातक के माध्यम से ही की है। गोस्वामी तुलसीदास ने तो चातक प्रेम का सागोपाग ही वर्णन किया है। दोहा सरस नेह लवलीन नव, द्वै सुजान रसखानि। ताके आस बिसास सो पगे प्रान रसखानि ॥६॥ शब्दार्थ—नेह = प्रेम। लवलीन = तन्मय। नव = नूतन। द्वै = दोनो, कृष्ण और राधा। अर्थ—कवि कृष्ण और राधा के मिलन की स्तुति करता हुआ कहता है कि जो राधा और कृष्ण के सरस तथा नूतन प्रेम मे तन्मय हैं, उन्ही की दया की आशा और विश्वास से मेरे प्राण सदैव सम्पृक्त है। कृष्ण का अलौकिकत्व सवैया ऽसकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै। नैक हिये जिहि आनत ही जड मूढ महा रसखानि कहावै। जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावै। ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥७॥ शब्दार्थ—सकर से सुर = शिव जैसे देव। चतुरानन = ब्रह्मा। नैक = थोडा-सा। आनत ही = लाते ही। जड़ मूढ = अत्यन्त मूर्ख। महा रसखानि = विपुल ज्ञान के भंडार। अदेव = किन्नर। भू-अगना = पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ। वारत प्रानन = प्राणो को न्यौछावर करके। अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस कृष्ण का जप शकर जैसे देव करते हैं, जिनका