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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग १६१ अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—श्रुत्यनुप्रास, छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग हुआ है । सवैया गावै गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेष सबै गुन गावत । नाम अनत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत । जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत ॥६॥ शब्दार्थ—गनिका = अप्सरा । गंधरब्ब = गंधर्व, संगीत-प्रिय देवयोनि । सारद = शारदा । सेष = शेषनाग । त्रिलोचन = शिव । छोहरियाँ = लड़की । छछिया = मिट्टी का छोटा-सा पात्र । अर्थ—कृष्ण की भवत-वत्सलता एव लोक-लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जिस कृष्ण के गुणो का गान अप्सरा, गंधर्व, शारदा और शेषनाग सभी करते है, गणेश जिसके अनत नामो का स्मरण करते है, ब्रह्मा और शिव जिसके रहस्य को नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिए योगी, यति, तपस्वी और सिद्ध निरन्तर समाधि लगाये रहते है, फिर भी उसका भेद नही जान पाते, उन्ही कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—इस सवैया मे छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग है । पाठान्तर—'गावत', 'पावत', 'लगावत' और 'नचावत' के स्थान पर क्रमशः 'गावै', 'पावै,' 'लगावै', ओर 'नचावै' पाठ भी मिलते है । सवैया लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक योगी भये पर अन्त न पावै । साँझ ते भोरहि भोर ते साझति सेस सदा नित नाम जपावै । ढूंढ़ फिरे तिरलोक मे साख सुनारद लै कर बीन बजावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछियां भर छाछ पै नाच नचावै ॥१०॥ शब्दार्थ—भोर = प्रात काल । साँझ ते भोरहि भोर ते साझहि = सन्ध्या- काल से प्रात काल तक और प्रात काल से सन्ध्याकाल तक; अर्थात् हर समय,

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