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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

१६२ रसखान-ग्रन्थावली निरन्तर । सेस = शेषनाग । तिरलोक मे = तीनों लोकों मे । सुनारद = महर्षि नारद । साख = साक्षी । अर्थ- कृष्ण के अलौकिकत्व का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि ब्रह्मा आदि अनेक योगी उस कृष्ण को जानने के लिए समाधि लगाये हुए हैं, पर वे उसका अन्त नही पाते, अर्थात् कृष्ण दुर्बोध्य और अनन्त हैं। शेष- नाग अपनी सहस्रो जिह्वाओ से निरन्तर उसका नाम जपते रहते हैं। महर्षि नारद अपने हाथ मे वीणा लेकर उसे बजाते हुए तीनो लोको मे ढूँढ़ फिरे हैं, पर कोई भी ऐसी साक्षी नही मिली, जिसके आधार पर वे यह दावा कर सकें कि उन्होने कृष्ण के रूप को जान लिया है। ऐसे दुर्बोध्य, अनन्त कृष्ण को अहीर की लडकियाँ एक मटकी छाछ के लिए नाच नचाती हैं। विशेष - यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया गुज गरें सिर मोरपखा अरु चाल गयद की मो मन भावै । साँवरो नन्दकुमार सबै ब्रजमंडली मैं ब्रजराज कहावै । साज समाज सबै सिरताज औ लाज की बात नही कहि आवै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥११॥ शब्दार्थ-गुज = गले मे पहनने का एक आभूषण । गयंद = हाथी । छाज = शोभा । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का तथा उनकी लौकिक लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि उनके गले मे गुंज नामक आभूषण है, सिर पर मोर-पखो का बना हुआ मुकुट है। हाथी जैसी मस्तानी चाल है जो मुझे बहुत ही अच्छी लगती है। यह साँवरा कृष्ण सारे ब्रज का शिरोमणि है, इसीलिए ब्रजराज कहलाता है। यह सारी शोभा का और सारे समाज का सिरताज है। इसकी शोभा का वर्णन नही किया जा सकता। ऐसे कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया भर छाछ के लिए नचाती रहती हैं। विशेष - 'साज समाज सबै सिरताज' मे वृत्यनुप्रास है।