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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग १६६ शब्दार्थ-चिनौती = चुनौती। अनंगहि = कामदेव को। भोग = ऐश्वर्य, 'पुरन्दर = इन्द्र । मगहिं = सिर पर । मुक्ति तरंगहि मुक्ति की तरंगो मे, ज्ञान की चरम कोटि पर । रग = प्रेम । रंगहिं = प्रेम मे । अर्थ - रसखान मनुष्य को कृष्ण-प्रेम के लिए प्रेरित करते हुए कहते है कि हे मनुष्य ! चाहे तुमने इतनी सम्पत्ति प्राप्त कर ली है कि उसकी विपुलता देखकर कुवेर को भी संकोच होता है, चाहे तुम इतने रूपवान हो कि अपने सौन्दर्य से कामदेव को चुनौती दे सकते हो, चाहे तुम्हारे पास इतनी सम्पत्ति ही गई है कि जिसे देखकर इन्द्र का मन भी ललचा जाए; चाहे तुमने योग- साधना के द्वारा गंगाधर शिव-रूप को प्राप्त कर लिया, चाहे तुम्हारी जीभ मुक्ति की लहरो मे डूब गई है, अर्थात् तुम ज्ञान की चरम कोटि पर पहुँच गये हो; किन्तु यदि तुमने मन लगाकर उस कृष्ण से प्रेम नही किया जो राधा- रानी से प्रेम करते है तो तुम्हारी ये उपलब्धियाँ व्यर्थ और निस्सार है । सवैया कंचन-मन्दिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा भलकैयत । प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत । जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मधवा ललचैयत । ऐसे भए तौ कहा रसखानि जौ साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत ॥२०॥ शब्दार्थ-कंचन मन्दिर = सोने के महल । मानिक = मोती । नग = हीरा । मधवा = इन्द्र । सावरे ग्वार सो = कृष्ण से । नेह = स्नेह, प्रेम । अर्थ - कृष्ण के प्रति प्रेम ही मनुष्य की सर्वाधिक मूल्यवान सम्पत्ति है । जिसे कृष्ण से प्रेम नही, उसके सभी प्रकार के वैभव निरर्थक है । इसी भाव को प्रस्तुत सवैया मे प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि माना तुमने सोने के ऊँचे-ऊँचे महल बनाकर उन्हे मोतियो से सदैव भलका रक्खा है। तुम्हारे पास इतने हीरे और मोती है कि प्रात काल से ही सारी नगरी उन्हे तराजूओ मे तोलने लगती है और फिर भी वे तुल नही पाते । तुम इतने वैभवपूर्ण राजा बन गए हो कि तुम्हारा वैभव देखकर इन्द्र का मन भी ललचाता है, अर्थात् तुम्हारे वैभव की तुलना मे वह अपने वैभव को अत्यन्त तुच्छ मानकर स्वय को दीन-हीन अनुभव करता है और चाहता है कि तुम्हारा जैसा वैभव उसके पास भी हो । यदि तुमने कृष्ण से प्रीति नही की है तो तुम्हारा यह सब अपार