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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

१७० रसखान-ग्रन्थावली वैभव व्यर्थ है। कहने का भाव यह है कि कृष्ण की प्रीति ही सबसे विशाल वैभव है। सारे सांसारिक वैभव उसके सामने तुच्छ और नगण्य है। विशेष—कृष्ण की प्रीति का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन होने से इस सवैया मे अत्युक्ति अलंकार है। पाठान्तर—तीसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'पालैं प्रजानि प्रजापति सो अरु सम्पति सो मघवाहि लजैयत।' तुलना—'ऐसे भये तो कहा तुलसी जु पै जानकीनाथ के रंग न राते।' —तुलसी कवित्त कहा रसखानि सुखसम्पत्ति सुमार कहा, कहा तन जोगी ह्वै लगाए अंग छार को। कहा साधे पंचानल, कहा सोए बीच नल, कहा जीति लाए राज सिंधु आर-पार को। जप वार-वार तप संजम बयार-व्रत, तीरथ हजार अरे बूझत लवार को। कीन्हौ नही प्यार नही सेयौ दरवार, चित, चाह्यौ न निहार्यौ जौ पै नंद के कुमार को॥२१॥ शब्दार्थ—रसखानि = आनन्द देने वाले भंडार। सुमार = गणना। छार = धूल, भस्म। पंचानल = पाँच प्रकार की अग्नियों से तप करना; चारो ओर से जलने वाली चार अग्नियाँ तथा ऊपर से सूर्य की प्रखर गर्मी। नल = जल बयार-व्रत = बिल्कुल भूखा रहकर तप करना। लवार = मूर्ख। नन्द के कुमार को = कृष्ण को। अर्थ—कृष्ण की भक्ति के बिना और सभी तप तथा योग साधनाएँ व्यर्थ है, इस भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि हे मनुष्य ! यदि तुमने कृष्ण से प्रेम नही किया, उसकी शरण मे नही गए, भावपूर्ण मन से उसे नही चाहा और प्रेममयी दृष्टि से उसे नही देखा तो तुम्हारे आनन्द देने वाले सारे भंडार व्यर्थ है, तुम्हारी सुख देने वाली सम्पत्ति की कोई गणना नही है, अर्थात् वे भी नगण्य है। शरीर पर भस्म लगाकर योगी बनने से कोई लाभ नही