रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १७१ है, पाँच अग्नियो के मध्य बैठकर तप करना अथवा जल मे समाधि लगाना भी निरर्थक है। समुद्र के आर-पार तक का राज्य जीत लेने से भी कोई लाभ नही है। हे मूर्ख ! कृष्ण के प्रेम के बिना वार-वार जप करने को, निरा- हार रहकर तप और सयम करने को तथा हजारो तीर्थो की यात्रा करने को कौन बूझता है ? अर्थात् ये सब बेकार है। विशेष—१. ‘कीन्हो नही प्यार, नही सेयौ दरबार, चित चाह्यौ, न निहारयौ जो मै नन्द के कुमार को’ मे कोमल वर्णो से युक्त वृत्यनुप्रास है। २ कृष्ण भक्तो की यह प्रमुख विशेषता है कि वे कृष्ण को छोडकर अन्य प्रकार की साधनाओ को निरर्थक और आडम्बरपूर्ण मानते है। रसखान के प्रस्तुत कवित्त मे यही विशेषता परिलक्षित होती है। पाठान्तर— कहा तन जोगी ह्वै’ और ‘कहा सोए बीच नल’ के स्थान पर ‘कहा महा जोगी ह्व ’ और ‘कहा सोए बीच जल’ पाठ भी मिलते है। कवित्त कचन के मन्दिरनि दीठि ठहराति नाहिं, सदा दीपमाल लाल-मानिक-उजारे सो। और प्रभुताई अब कहाँ लौ बखानौ, प्रति, टारन की भीर भूप टरत न द्वारे सो। गगाजी मे न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ, वेद, बीस बार गाइ, ध्यान कीजत सवारे सो। ऐसे ही भए तौ नर कहा रसखानि जो पै, चित्त दै न कीनी प्रीति पीतपटवारे सो ॥२२॥ शब्दार्थ—कचन के मन्दिरनि = सोने के महलो पर । दीठि = दृष्टि । लाल मानिक = लाल मोती । प्रतिहारन की भीर = द्वारपालो की भीड । मुक्ताहलहू = मोतियो को । सवारे सो = शीघ्रता से, प्रात काल मे । पीतपट- वारे सो = कृष्ण से । अर्थ—कृष्ण की प्रीति के अभाव मे दुनिया के सारे वैभव और सारी साधनाएँ निरर्थक है, इस भाव को व्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि हे