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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग १७३

मस्त बने हुए हैं । विशेष १ अनन्यभाव का प्रेम अभिव्यजित है । २. 'वक' शब्द का प्रयोग कवि के मन की अतिशय घृणा का सूचक है । ३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रथावली' में यह सवैया नही है । सवैया सुनियै सब की कहिये न कछू रहियै इमि या भव-वागर मै । करियै व्रत-नेम सच्चाई लिये जिन ते तरियै मन-सागर मै । मिलियै सब सो दुरभाव बिना रहिये सतसंग उजागर मै । रसखानि गुविन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित गागर मै ॥२४॥ शब्दार्थ—इमि = इस प्रकार । भव-बागर मै = असत्य ससार मे । उजा- गर = प्रकाश । नागरि = स्त्री । गागर = पानी का बर्तन । अर्थ—रसखान सासारिक मनुष्य को उपदेश देते हुए कहते है कि हे मनुष्य ! तुम इस असत्य ससार मे इस प्रकार रहो कि सबकी सुनो, पर अपनी बात किसी से भी मत कहो । जो भी व्रत और नियम ग्रहण करो वे सत्य हो । सत्य व्रत और नियमो से ही मन का सागर पार किया जा सकता है, अर्थात् मन को अपने वश मे किया जा सकता है; सबसे अच्छी भावना लेकर मिलो और सदैव सत्सग के प्रकाश मे रहो, अर्थात् अच्छी सगति मे ही उठो-बैठो और एकाग्रमन से कृष्ण की भक्ति करो तुम्हारा मन कृष्ण की भक्ति मे उसी प्रकार एकाग्रता से लगना चाहिए जिस प्रकार स्त्री का मन अपने पानी के बर्तन मे लगा होता है । (स्त्रियाँ अपने सिर पर जब पानी का बर्तन लेकर चलती हैं तो उसके हाथ नही लगाती । वह गिर न जाये, इसलिए उसका सन्तुलन बनाये रखने के लिए वह उसकी ओर एकाग्र मन लगाये रहती है) । विशेष—१ 'भव-बागर' और 'मन-सागर' मे रूपक अलकार; 'मिलियै सब सो दुरभाव बिना' मे विनोक्ति अलकार, 'रसखानि गुविन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित गागर मैं' मे उपमा अलकार है । २. 'जिमि नागरि को चित गागर मे' इस पदाश का एक अर्थ यह भी हो सकता है—