रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ रसखान-ग्रन्थावली जिस प्रकार पनिहारी का ध्यान सिर पर रखे हुए पानी भरे घडे की ओर होता है। पनिहारी सिर पर जल का घडा लिए चलती-फिरती, हाथ हिलाती तथा बातें करती रहती है, पर उसका ध्यान अपने घटे की ओर से विचलित नही होता । (इसी प्रकार मनुष्य को समार मे रहते हुए भी, उसके नैमित्तिक कार्यों को करते हुए भी, अपना एकाग्र ध्यान कृष्ण-भक्ति की ओर लगाये रखना चाहिए)। तुलना—'श्री हरिदाम के स्वामी स्यामा कु जविहारी सो चित्त ज्यो मिर पर दोहनी ।' —हरिदास सवैया है छल की अप्रतीत की मूरति मोद बढ़ावै विनोद कलाम मे । हाथ न ऐहे कछू रसखान तू क्यो वहकैं विष पीवत काम मे । है कुच कंचन के कलसा न ये आम की गाँठ मढ़ीक की चाम मे । वैनी नही मृगनैनिन की ये नसैनी लगी यमराज के धाम मे ॥२५॥ शब्दार्थ—अप्रतीत=विश्वासघात । कलाम=वाक्य, वचन । काम= काम-वासना । वैनी=चोटी । नसैनी=सीढ़ी । अर्थ—नारियो के गोन्दर्य पर मुग्ध होकर कृष्ण-भक्ति को भूल जाने वाले मनुष्यो को चेतावनी देते हुए रसखान कहते है कि हे मनुष्यो ! ये सुन्दर नारियाँ छल और विश्वासघात की मूर्ति हैं। विनोद के वाक्य कह-कहकर ये जो आनन्द प्रदान करती हैं, वह आनन्द झूठा है । अत तुम काम-भावना के वशीभूत होकर तथा पथ-भ्रष्ट होकर क्यो विष-पान कर रहे हो, इसमे कुछ भी हाथ नही लगेगा । इनके उन्नत कुच स्वर्ण-कलश नहीं है, वरन् चाम मे मढ़ी हुई आम की गाँठ है। ये सुन्दर नारियो की चोटियाँ नहीं हैं, वरन् नरक को ले जाने वाली सीढियाँ है । विशेष १ शुद्धापन्हुति अलकार । २. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रंथावली' मे यह सवैया नही है ।