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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग १७५ मिलन सवैया मोर के चन्दन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नद को नंदन । श्री वृषभानुसुता दूलही [दिन जोरि वनी विधना सुखकदन ॥ आवै कह्यो न कछू रसखानि ही दोऊ बँधे छवि प्रेम के फदन । जाहि बिलोके सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन है दुखदंदन ॥२६॥ शब्दार्थ—मोर के चंदन = मोर-पखो के चन्दवे। अली = सखी । श्रीवृष- भानुसुता = राधा। सुखकदन = सुख देने वाली । ब्रजजीवन = कृष्ण । दुखदंदन = दुख दूर करने वाले । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुए कहती है कि हे सखि ! मोर-पखों के चन्दवो का मुकुट पहने हुए कृष्ण दूल्हा बने हुए है और अत्यन्त सुख देने वाली राधा दूलहिन बनी हुई है । रसखान कहते है कि उन दोनो की अवस्था का वर्णन नही किया जा सकता । दोनो प्रेम के बंधन मे बँधे हुए हैं। जिनको देखकर सभी लोगो को सुख प्राप्त होता है, वे दुख दूर करने वाले श्री कृष्ण है । सवैया मोहिनी मोहन सो रसखानि अचानक भेट भई वन माही । जेठ की घाम भई सुखधाम अनद ही अग ही अग समाही ॥ जीवन को फल पायौ भटू रस-बातन केलि सो तोरत नाही । कान्ह को हाथ कँधा पर है मुख ऊपर मोर किरीट की छाही ॥२७॥ शब्दार्थ—मोहिनी = राधा । घाम = धूप । सुखधाम = सुख का भण्डार । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज अचानक राधा और कृष्ण की भेट वन के अन्दर हो गई। उस मिलन मे उन्हे जेठ की तपती हुई धूप भी सुख का भंडार बन गई । वे आनन्द के कारण अगो मे अगो को छिपाने का प्रयास करने लगे । हे सखि ! उन्होने प्रेम-पूर्ण बातो के द्वारा ही जीवन का फल पा लिया, अर्थात् उनका जन्म सफल हो गया । वे अपनी क्रीड़ा को अवाध गति से चलाते रहे ।