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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१७६ रसखान-ग्रन्थावली कृष्ण का हाथ राधा के कन्धे पर था और उसके मुख पर मोर-मुकुट की छाया थी । पाठान्तर-कुछ थोडे से परिवर्तनो के साथ इस सवैया का यह रूप भी मिलता है- 'मोहनी मोहन सो रसखान अचानक भेट भई वन माही । जेठ को घाम भयौ सुखधाम अनग प्रभंजन अग समाही । जीवन को फल पायौ भटू रस बातन की लरु तोरत नाही । कान्ह के हाथ कँधा पै लसै मुख ऊपर मोर किरीट की छाही ॥ सवैया लाडली लाल लसै लखि वै अलि कुंजनि क जनि मैं छवि गाढी । ऊजरी ज्यौं विजुरी सी जुरी चहुँ गुजरी केलि-कला सम बाढी । त्यौ रसखानि न जानि परै सुखिया तिहुँ लोकन की अति वाढी । बालक लाल लिये विहर छहरै वर मोरमुखी सिर ठाढी ॥२८॥ शब्दार्थ-लाल = कृष्ण । अलि = सखी । पुंजनि = समूह । ऊजरी = उज्ज्वल । सुखमा = शोभा । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से मिलन-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखी ! राधा और कृष्ण को कुंजो के समूहो मे देखकर उन कुंजो की शोभा बहुत अधिक बढ गई । राधा के शरीर की उज्ज्वल कांति बिजली की कान्ति के समान मालूम होती थी जिसके चारो ओर घिरी हुई गुर्जरीयाँ केलि-कला के समान चमक रही थी । रसखान कहते है कि इस प्रकार उस सौन्दर्य का वर्णन अगम्य था क्योकि उसके कारण तीनो लोको का सौन्दर्य बहुत अधिक बढ गया था। वह कृष्ण गोपियो के लिये हुए उन कुंजो मे विहार कर रहे थे धीर उनके सिर के ऊपर सुन्दर मोरपंखो का मुकुट सुशोभित था। विशेष-उपमा, वृत्यानुप्रास अलकार । बाल-लीला सवैया लाल की आज छठी ब्रज लोग अनन्दित नन्द बड्यौ अन्हवावत । चाइन चारु बधाइन लै चहुँ ओर कुटुम्ब अघात न यावत ।