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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

१७६ रसखान-ग्रन्थावली कृष्ण का हाथ राधा के कन्धे पर था और उसके मुख पर मोर-मुकुट की छाया थी । पाठान्तर-कुछ थोडे से परिवर्तनो के साथ इस सवैया का यह रूप भी मिलता है- 'मोहनी मोहन सो रसखान अचानक भेट भई वन माही । जेठ को घाम भयौ सुखधाम अनग प्रभंजन अग समाही । जीवन को फल पायौ भटू रस बातन की लरु तोरत नाही । कान्ह के हाथ कँधा पै लसै मुख ऊपर मोर किरीट की छाही ॥ सवैया लाडली लाल लसै लखि वै अलि कुंजनि क जनि मैं छवि गाढी । ऊजरी ज्यौं विजुरी सी जुरी चहुँ गुजरी केलि-कला सम बाढी । त्यौ रसखानि न जानि परै सुखिया तिहुँ लोकन की अति वाढी । बालक लाल लिये विहर छहरै वर मोरमुखी सिर ठाढी ॥२८॥ शब्दार्थ-लाल = कृष्ण । अलि = सखी । पुंजनि = समूह । ऊजरी = उज्ज्वल । सुखमा = शोभा । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से मिलन-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखी ! राधा और कृष्ण को कुंजो के समूहो मे देखकर उन कुंजो की शोभा बहुत अधिक बढ गई । राधा के शरीर की उज्ज्वल कांति बिजली की कान्ति के समान मालूम होती थी जिसके चारो ओर घिरी हुई गुर्जरीयाँ केलि-कला के समान चमक रही थी । रसखान कहते है कि इस प्रकार उस सौन्दर्य का वर्णन अगम्य था क्योकि उसके कारण तीनो लोको का सौन्दर्य बहुत अधिक बढ गया था। वह कृष्ण गोपियो के लिये हुए उन कुंजो मे विहार कर रहे थे धीर उनके सिर के ऊपर सुन्दर मोरपंखो का मुकुट सुशोभित था। विशेष-उपमा, वृत्यानुप्रास अलकार । बाल-लीला सवैया लाल की आज छठी ब्रज लोग अनन्दित नन्द बड्यौ अन्हवावत । चाइन चारु बधाइन लै चहुँ ओर कुटुम्ब अघात न यावत ।

व्याख्या भाग १७७ नाचत बाल बड़े रसखान छके हित काहू के लाज न आवत । तैसोइ मात पिताउ लह्यौ उलह्यौ कुल ही कुलही पहिरावत ॥२६॥ शब्दार्थ—लाल=कृष्ण। छठी=जन्म के छठे दिन का उत्सव । अन्ह- वावत=स्नान कराते है । चाइन=चाव से । चारु=आनन्दपुर । छके हित= प्रेम मे मस्त । उलह्यौ=आनन्द । कुल ही=सारा परिवार ही । कुल ही= एक प्रकार की टोपी । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छठी-उत्सव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज कृष्ण के जन्म के छठे दिन का उत्सव है । सारे ब्रज के लोग आनन्द से भरे हुए है । नन्द अत्यन्त आनन्दित होकर कृष्ण को स्नान करा रहे है । लोग चाव से तथा चारो ओर से आनन्दप्रद बधाइया लेकर आ रहे हैं । कुटुम्ब मगल-गीत गाता हुआ तृप्त नही हो रहा है । इच्चे और बड़े सभी आनन्द-सागर कृष्ण के प्रेम से इतने मस्त होकर नाच रहे है कि उन्हे किसी प्रकार की लज्जा का अनुभव नही हो रहा है। इसी प्रकार का आनन्द माता यशोदा और पिता नन्द को भी प्राप्त हो रहा है । सारा परिवार उन्हे कुलही पहिना रहा है । विशेष—१. अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । तुलना—'आजु भोर तमचुर के दोल । गोकुल मे आनन्द होत है, मगल-धुनि महराने टोल । फूले फिरत नन्द अति सुख भयौ, हरषि मगावत फूल-तमोल । फूली फिरति जसोदा तन-मन, उबटि कान्ह अन्हवाइ अमोल ।' —सूरदास सवैया 'ता' जसुदा कह्यो धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरै हरि भूलै । ढूँढन कूँ पग चारि घलै मचलै रज माँहि विथूरि दुकूलै । हेरि हंसे रसखान तबै उर भाल तै टारि कै बार लटूलै । सो छवि देखि अनन्दन नन्दजू अंगन अंग समात न कूलै ॥३०॥

१७८ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—'ता' जसुदा कह्यो घेनु की ओट=यशोदा ने कृष्ण को खिलाते समत गाय की ओट मे होकर 'ता' शब्द कहा । ढिंढोरत ताहि=यशोदा को ढूंढ़ते हैं। रज मांहि विथूरि दुकूलै=अपने वस्त्रों को धूल से लथपथ कर लेते हैं। उर भाल तें=मस्तक के बीच से। वार लूतलैं=लम्बे-लम्बे बाल। अर्थ—कृष्ण की बाल-लीला का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! कृष्ण को खिलाने के लिए यशोदा ने गाय की ओट मे होकर 'ता' शब्द कहा जिसे सुनकर कृष्ण अपनी और बातों को भूलकर उन्हे ढूढते हैं। वे उन्हे ढूढने के लिए कुछ ही पग चलते हैं, किन्तु यशोदा को न पाकर वे मचल जाते हैं और पृथ्वो पर लोट-लोटकर अपने वस्त्रो को धूल से लथपथ कर लेते हैं। तब यशोदा उनके पास आती हैं। उन्हें देखकर कृष्ण हँसने लगते है और यशोदा उनके मस्तक पर पड़े हुए लम्बे-लम्बे बालों को हटाकर उनका मुह चूम लेती हैं। इस शोभा को देखकर नन्द इतने प्रसन्न होते हैं कि उनकी प्रसन्नता उनके अंगो मे नही समा पाती । विशेष—१. बाल-लीला का अत्यन्त स्वाभाविक वर्णन है । २. अन्तिम पंक्ति मे यमक अलंकार है । ३ श्री विश्वनाथ मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' में यह सवैया नही है । तुलना—'गैया की सुओट ह्वै ललैया बिलुकैया दै दै, जसोमति मैया जबै कन्हैया सो 'ता' कहै।' —अज्ञात सवैया— आजु गई हुती भोर ही हों रसखान रई वटि नन्द के भौनहिं । वाकौ जियो जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यो नहिं । तेल लगाइ लगाइ कै अँजन भौंहे बनाइ बनाइ डिठौनहिं । डांलि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यौं चुचकारत छौनहिं ॥३१॥ शब्दार्थ—रई=अनुरक्त हो गई। भौनहिं=भवन में । जुग=युग। अंजन=काजल । डिठौनहिं=डिठौने को; अपने पुत्र को नजर से बचाने के लिए माताएं उनके मुख पर काजल का काला दाग लगा देती हैं, जिसे डिठौना

व्याख्या भाग १७६ कहते है। छौनहिं=पुत्र को, कृष्ण को। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मै आज ही प्रात.काल नन्द के उस भवन मे गई थी जहाँ रस के सागर कृष्ण थे। मैं उन्हे देखते ही उनमे अनुरक्त हो गई। उन जैसा पुत्र पाकर यशोदा जी को जो सुख मिला है, उसका वर्णन नही किया जा सकता। मै तो भगवान् ने प्रार्थना करती हूँ कि उनका पुत्र लाख करोड युगो तक जीवित रहे। यशोदा जी ने उसके सिर पर तेल लगाकर और आँखों मे काजल लगाकर तथा उसकी भौहो को सँवार कर उसके मुख पर डिठौना लगा दिया। उसके गले मे हमेल और हार डालकर यशोदा जी उनके सौन्दर्य को निहारती रही, उस पर स्वय को न्यौछावर करती रही और उसे चूमती रही। विशेष—'डालि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यो चुचकारत छौनहि' के दोनो पदो मे यमक अलकार है। सवैया— धूरि भरे अति सोभित स्यामजू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी। वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज कोटी। काग के भाग बडे सजनी हरि-हाथ सो लै गयौ माखन-रोटी ॥३२॥ शब्दार्थ—धूरि भरे=धूल से सने हुए। पीरी=पीली। वारत= न्यौछावर करती है। काम=कामदेव। कला=सुन्दरता। कोटी=कोटि, करोड़ो। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुन्दरता का वर्णन करती हुई कहती है कि धूल से सने हुए शरीर वाले श्री कृष्ण अत्यन्त शोभायमान थे। ऐसी ही शोभा से युक्त उनके सिर की सुन्दर चोटी बनी हुई थी। वे खेलते हुए और माखन-रोटी खाते हुए अपने आगन मे घूम रहे थे। उनके पैरो की पैजनी बज रही थी। वे पीली लगोटी पहने हुए थे। उनकी उस समय की शोभा को देखकर कामदेव भी अपनी करोडो सुन्दरताओ को उस पर न्यौछावर कर रहा था। हे सखि ! उस कौवे का बहुत बडा सौभाग्य है

१८० . रसखान-ग्रन्थावली है जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी झपटकर उड़ गया । विशेष—१. कृष्ण की बाल-लीला का सुन्दर एव स्वाभाविक वर्णन है । २. 'वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज कोटी' मे व्यतिरेक अलकार है । पाठान्तर—चतुर्थ पंक्ति का यह पाठ भी मिलता है काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सो ले गयौ माखन-रोटी । तुलना— 'सोभित कर नवनीत लिए । घुटुरुनि चलत रेनु तन मण्डित, मुख दधि लेप किए । चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिए । लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहि पिए । कठुला-कंठ, ब्रज केहरि-नख, राजत रुचिर हिए । धन्य सूर एको पल इहि सुख, का सत कल्प जिए ॥ —सूरदास रूप-माधुरी सवैया मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी । अँग ही अँग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी ॥ पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झांके झरोखे मै बाँके विहारी ।३३। शब्दार्थ—लट=केश-राशि । जराव=जड़ाऊ आभूषण । जरतारी= जरीवाली । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि उस नटवर कृष्ण के गले मे मोतियो की माला पड़ी हुई है। घूँघरदार केश-राशि लटक रही है। अंग के प्रत्येक भाग मे जडाऊ आभूषण और सिर पर जरी वाली पगड़ी सुशोभित है । रसखान कहते है कि पूर्व जन्म के पुण्यो के कारण ही इस मोहिनी मूर्ति के दर्शन हुए है। चारो दिशाओ की शोभा लेकर बाँके कृष्ण आकर तभी झरोखे मे झाँकने लगे । विशेष—कृष्ण की रूप-माधुरी का परम्परागत वर्णन है ।

व्याख्या भाग १८१ पाठान्तर—इस सवैया का यह रूप भी मिलता है— 'मोतिन माल हिये लटकै लटकै लट चौलट घूँघरवारी । अंगनि अंग जराव कसे यह सीस लसै पगिया जरतारी । पूरव पूरे ही पुन्यनि ते रसखान ये मूरति नैन निहारी । चारौ दिसा के महा अघ हाँके जो झाँके झरोवनि बाँके विहारी ॥ सवैया आवत है बन ते मनमोहन गाइन सग लसै ब्रज-ग्वाला । बेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगौ कछु ख्याला ॥ हेरत टेरि ककै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन ते ब्रज-वाला । देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्योस को ताप-कसाला ॥३४॥ शब्दार्थ—गाइन = गायो के । लसै = सुशोभित हो रहे है । अभीत = निडर होकर । ख्याला = खेल । द्योस = दिन । ताप-कसाला = थकान । अर्थ— श्रीकृष्ण गाये चराकर शाम को बन से ब्रज लौट रहे है । गायों के साथ ब्रज के ग्वाले सुशोभित हो रहे है । बंशी बजाते हुए गोचारण के गीत गाते हुए निडर होकर कृष्ण इधर कुछ खेल-सा कर गये है । उन्हे देखने के लिए चारो ओर से ब्रजवालाये आकर झरोखो से झाँकने लगी है । रसखान कवि कहते है कि उनके मुख की शोभा को देखकर सारी ब्रज-वनिताएँ अपनी दिन-भर की थकान को भूल गई, अर्थात् उनके जीवन मे नवीन चेतना और स्फूर्ति आ गई । पाठान्तर—'आवत है वन ते मनमोहन गाइन सग लसै ब्रज-ग्वाला । बेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगौ कछु ख्याला । हेरत टेर थकी चहुँ ओर तै झाँकि झरोकनि सो ब्रजवाला । देखत आनन को रसखान तज्यौ सब द्यौस को ताप कसाला ॥' कवित्त गोरज विराजै भाल लहलही बनमाल, आगे गैयाँ पाछे ग्वाल गावै मृदु तानि री । तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर मधुर जैसी, बंक चितवनि मन्द मन्द मुसकानि री ।

१८२ रसखान-ग्रन्थावली कदम विटप के निकट तटनी के तट, अटा चढि चाटि पीत पट फहरानि री । रस वरसावै तन तपनि बुझावै नैन, प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥३५॥ शब्दार्थ—लहलही = सुन्दर । विटप = वृक्ष । तटनी =-नदी, यमुना नदी । रस = आनन्द । तन-तपनि = शरीर के दुख । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि उसके मस्तक पर गोरज तथा हृदय पर सुन्दर बनमाला सुशोभित है । उसके आगे आगे गाये है, पीछे-पीछे ग्वाले है। गायो और ग्वालो के मध्य मे वह मनोहर बांसुरी बजा रहा है। जितनी सुन्दर बासुरी की ध्वनि है, उतनी ही सुन्दर उसकी वक्र चितवन और मन्द हंसी है। वह यमुना नदी के तट पर कदम्ब वृक्ष के पास है। हे सखि ! यदि तू उसके पीले वस्त्रों के फहराने को देखना चाहती है तो अटारी पर चढकर देख ले। आनन्द की वर्षा करता हुआ, शरीर के दुखो को नष्ट करता हुआ तथा नेत्र और प्राणों को मोहित करता हुआ वह आनन्द-सागर कृष्ण आ रहा है। सवैया अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गांठन खोलत है ॥ सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है । रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है ॥३६॥ शब्दार्थ—महामृदु = अत्यन्त मधुर । बूडि गयौ = डूब गया । मधि = मध्य मे, अन्दर । कलोलत है = किल्लोले करता है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण अत्यन्त सुन्दर है और वे अत्यन्त मधुर वाणी बोलते है । वे मुझे देखकर अपने नेत्रो की कोरो से कटाक्ष चलाकर लाज को दूर कर देते है, अर्थात् उनसे इतना प्रेम हो जाता है कि लोक-लाज की कोई चिन्ता नही रहती । हे सजनी ! सुनो, वह विलक्षण कृष्ण प्रत्येक कुंज मे घूमता रहता है । उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर मेरा मन उसके रूप- सागर मे डूबकर किल्लोले करता है ।

व्याख्या भाग १८३

विशेष—रूपक अलंकार । पाठान्तर—इस सवैये की दूसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— ‘वह नैन की कोर कटाछन लाय कै लाज की ग्रथनि खोलत है ।’ तुलना—‘चित्त चप जाय परे सोभा के समुद्र माँझ, रही न सभार कछु और भई पल मे । मन मेरो गरूवो गयौ री बूडि मै न पायौ, नैन मेरे हरूवे तिरत रूप जल मे ।’ गंग कवि सवैया तै न लख्यौ जब कुंजनि ते बनिकै निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री ॥ को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रज लोग फिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरि वा नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ॥३७॥ शब्दार्थ—बनिकै=सुन्दर रूप धारण करके । हरा=हार । किरीट= मुकुट । भटक्यौ=रूप से झकझोरा हुआ । हटक्यौ=मना करने पर भी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! तब कृष्ण भटकता हुआ और मटकता हुआ सुन्दर रूप धारण करके कुंज मे से निकाला था, तब तूने उसे नही देखा । उसके हृदय पर पड़ा हुआ हार कितना शोभायमान था और सिर पर लटकता हुआ मुकुट कितना सुन्दर दिखाई पड रहा था । रसखान कहते है कि ब्रजवासियो के मना करने पर भी वह रूप से झकझोरा हुआ कृष्ण भटकता हुआ फिर रहा था । उस नटवर कृष्ण का सारा सौन्दर्य मेरे हृदय मे अटक गया है, अर्थात् उसके सौन्दर्य का गम्भीर प्रभाव मेरे हृदय पर पड़ा है । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे ‘अटक्यौ’ शब्द की तीन बार आवृत्ति प्रभाव- शीलता मे सहायक है । वीप्सा अलंकार । पाठान्तर—इस सवैये की अन्तिम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— ‘रूप सबै हरि वा नट को हियरे फटक्यौ भटक्यौ अटक्यौ री ।’

१८४ रसखान ग्रन्थावली सवैया नैननि वक्र विसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली । बेधत हैं हिय तीछन कोर सुमार गिरी तिय कोटिक हेली ॥ छोरै नहीं छिनहूँ रसखानि सु लागी फिरै द्रुम सो जनु बेली । रोरि परी छवि की ब्रजमण्डल कुंडल गंडनि कुंतल केली ॥३८॥ शब्दार्थ—नवेली=नई, युवती । सुमार=भयंकर मार से । कोटिक= करोड़ों । हेली=सखी । द्रुम=वृक्ष । रोरि=कोलाहल । कुंडल गंडनि कुन्तल केली=कुंडल से सुशोभित गंडस्थल पर केशों की क्रीड़ा । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! ऐसी कोई भी युवती नहीं है जो कृष्ण के वक्र एवं विशाल नेत्र-रूपी बाणों की चोट को सह सके । ये बाण अपनी तीक्ष्ण नोकों से हृदय को बेधते हैं और करोड़ों नारियाँ इनकी भयंकर मार से गिर गई हैं । आनन्द-सागर कृष्ण फिर उन नारियों से क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़े जाते और वे उनसे उसी प्रकार चिपट जाती हैं जिस प्रकार वृक्ष से बेल लिपट जाती है । सारे ब्रज में कृष्ण की शोभा तथा उनके कुंडल से सुशोभित गंडस्थल पर केशों की क्रीड़ा का कोलाहल मचा हुआ है । विशेष—रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार । सवैया अलवेली विलोकनि बोलनि औ अलवेलियै लोल निहारन की । अलवेली सी डोलनि गंडनि पै छवि सो मिली कुंडल वारन की ॥ भटू ठाढ़ी लख्यौ छवि कैसे कहौं रसखानि गहे द्रुम डारन की । हिय मै जिय मै मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥३९॥ शब्दार्थ—अलवेली=विलक्षण । विलोकनि=दृष्टि । लोल=चंचल । गंडनि पै=गंडस्थलों पर । वारन=हाथी । द्रुम=वृक्ष । निरवारन की= छूटने की । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसकी दृष्टि और वाणी विलक्षण हैं; उसकी चंचल दृष्टि भी विलक्षण-सी है । उसके कपोलों पर कुंडलों की छवि हाथी के गड-

व्याख्या भाग १८५ स्थल पर पड़ी हुई छवि की भाँति विलक्षण है। हे सखि ! मैने उसको (कृष्ण को) पेड़ की डालियाँ पकड़ कर खड़े हुए देखा था। उस समय उसकी जो शोभा थी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसकी रस से भरी हुई मुस- कान मेरे हृदय मे और मन मे भर गई है। उसको छूटने की मुझे कौन शिक्षा दे सकती है ? अर्थात् किसी के कहने से भी वह नहीं छूट सकती। पाठान्तर—'अलबेली विलोकनि बोलनि है अलबेली सु लोलनि हारन की। अलबेली सी डोलनि गडनि पै छवि कुंडल सो मिलि बारन की। भटू ठाढो लख्यो छवि कैसे कहौ रसखान गहै द्रुम डारन की। हिय मे जिय मे मुसकानि रमी गति को सिखवै निरवारन की॥' सवैया बाँकी बड़ी अँखियाँ बडरारे कपोलनि बोलनि कौ कल बानी। सुन्दर रासि सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ॥ ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी। डोलति है बन बीथिन मै रसखानि मनोहर रूप-लुभानी ॥ ४० ॥ शब्दार्थ—बडरारे = बड़े, विशाल। कल = सुन्दर। सुधानिधि = चन्द्रमा। सुधारस-सानी = अमृत से युक्त। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से किसी अन्य नवीन गोपी का, जो कृष्ण से प्रेम करती है, वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । जब से उस नवीन गोपी ने अत्यन्त सुख देने वाले, वक्र तथा विशाल नेत्र वाले, पुष्ट कपोल वाले मधुर भाषण करने वाले, सुन्दर हँसी वाले, चन्द्रमा के समान मुख वाले और अमृत जैसे प्रेम से युक्त शरीर वाले कृष्ण को देखा है, तब से वह उनकी खोज मे वनो मे और गलियो मे घूमती फिर रही है तथा उनके मनोहर रूप पर लुब्ध हो गये है। विशेष—द्वितीय पंक्ति मे उपमा अलंकार। सवैया दृग इने खिंचे रहैं कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही । छकि छैल छबील छटा छहराइ कें कौतुक कोटि दिखाइ रही ॥ झुकि भूमि झमाकनि चूमि भ्रमी चरि चाँदनी चन्द चुराइ रही। मन भाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही ॥ ४१ ॥

१८६ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—कानन लौ = कानो तक। आनन = मुख । कौतुक = खेल । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि उनके दोनो नेत्र कानो तक खिंचे रहते है ; अर्थात् उनके नेत्र विशाल है , उनके केश मुख पर लहराते रहते हैं उनकी सुन्दर शोभा की कांति बिखर कर करोडो प्रकार के खेल दिखा रही है। उसकी शोभा झुककर, घूमकर और, अमृत को चूमकर चन्द्रमा की चाँदनी को चुरा रही है । रसखान कहते हैं कि कृष्ण की महा छवि मनमोहक है, इसीलिए वह मन को तरसा रही है। विशेष —द्वितीय और तृतीय पंक्ति मे छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास । सवैया लाल लसै पगिमा सब के सबके पट कोटि सुगवंधि भीने । अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने ॥ मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुंवार सिंगार सो कीने । पै सिगरे ब्रज के हरि ही हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥ ४२ ॥ शब्दार्थ—कोटि = करोड़ । जराउ = आभूषण । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सारे ग्वालो के सिर पर लाल पगड़ी सुशोभित है, सभी के वस्त्र करोड़ों प्रकार की सुगन्धियो से सुगन्धित हो रहे है । रसखान कहते है कि सभी के अंग अनेक प्रकार के आभूषणो से सुशोभित है । सभी के गलो मे मोतियो की मालाये सुशोभित हैं, सारे युवक ग्वाल शृंगार किये हुए हैं, किन्तु श्रीकृष्ण सारे ब्रज के सिंह हैं । अर्थात् सभी मे श्रेष्ठ है । उन्होने अपने हृदय पर पड़ी हुई लहलहाती वनमाला से ही सबके हृदय अपने वश मे कर लिए । विशेष—अंतिम पंक्ति मे यमक अलंकार । सवैया वह घेरनि धेनु अवेर सबेरनि फेरनि लाल लकुट्टनि की । वह तीछन चच्छु कटाछन की छवि मोरनि भौह भृकुट्टनि की ॥

व्याख्या भाग १८७ वह लाल की चाल चुभी चित मै रसखानि संगीत उघट्टनि की । वह पीतपटकवनि की चटकनि लटककनि मोर मुकुट्टनि की ॥ ४३ ॥ शब्दार्थ—घेरनि = घेरना । अबेर = देर से । सबेरनि = जल्दी से । घेरनि = घुमाना । ललुकट्टनि की = लाठी का । चच्छु = चक्षु, आँख । पटकवनि की = वस्त्रो की । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण का देर से या जल्दी से गायो को घेरना, अपनी लाठी को घुमाना, आँखो के द्वारा तीक्ष्ण कटाक्ष करना , भौह और भृकुटियो की मोड़ने की शोभा, सगीत की ताने बजाना, पीले वस्त्रो की फडफडाहट और मोर-मुकुंट का लटकना, ने कृष्ण की सभी चाले मेरे मन मे घर कर गई है । विशेष—अनुभावो की सुन्दर योजना है । सवैया साँझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन मौ ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजबाम सुलाज सनेह दुरै उभकै री ॥ गोधन धूरि की धूँधरि मै तिनकी छबि यौ रसखानि तकै री पावक के गिरि ते बुधि मानौ चुँवा-लपटी लपटै ललकै री ॥ ४४ ॥ शब्दार्थ—साँझ समै = सन्ध्या के समय मे । पेखन कौ = देखने के लिए । ललकै = इच्छा करना । धूँधरि मैं = धुंधलेपन मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के रूप की शोभा इतनी आकर्षक है कि सन्ध्या के समय उसे व्रज को लौटते समय देखकर मन उसे देखने के लिए इस प्रकार प्रबल इच्छा करने लगता है कि व्रज की युवतियाँ लज्जा और प्रेम के कारण ऊँची अट्टालियो पर चढकर उभक-उभक कर इसे देखने लगती है । रसखान कहते है कि गौओ के सुरो से उठी हुई धूलि से धुँधलेपन मे कृष्ण की छवि इस प्रकार दिखाई देती है, मानो आग के पहाड से बुझकर धुँए के बादल चढे आ रहे हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार ।

१८८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया देखिक राम महावन को इक गोपवधू कह्यो एक वधू पर । देखति हौ सखि मार से गोप कुमार बने जितने ब्रज-भू पर ॥ तीछे निटारि तयौ रसखानि सिंगार करै किन कौऊ बह पर । फेरि फिरै अँखियाँ ठहरानि है कारे पिनम्बर वारे के ऊपर ॥ ५४ ॥ शब्दार्थ—मार = स्मर, काम देव । तीछे = तिरछी दृष्टि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के द्वारा रचाई गई रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने महावन में रासलीला रची थी। जितने भी ब्रज के गोप हैं वे सब इस प्रकार से सजे हुए थे कि वे कामदेव की भाँति दिखाई पड़ते थे । मैंने तिरछी दृष्टि से उनका देखा, वे कुछ न कुछ शृंगार किये हुए थे , अथवा विविध प्रकार के शृंगारों से सुसज्जित थे । उन्हें देखने के बाद फिर दृष्टि पीताम्बर धारीकृष्ण पर जाती थी । वे भी इतने सुशोभित हो रहे थे कि आँखें बार-बार उन्ही पर जाकर ठहरती थी । सवैया दमकैं रवि कुंडल दामिनी से धुरवा जिमि गोरज गाजत है । मुकताहल-वारन गोपन के मु ती बूँदन की छवि छाजत है ॥ ब्रजवाल नदी उमड़ी रसखानि मयकवधू-द्युति लाजत है । यह ग्रावन श्री मनभावन की वरषा जिमि आज विराजत है ॥ ४६ ॥ शब्दार्थ—रवि-कुंडल सूर्य जैसी तेज चमक वाले कुंडल । दामिनी= बिजली। धुरवा = बादलों के स्तम्भ । गोरज = गऊओं के पैरों से उठी हुई धूलि । मुक्ताहल = मोती । मयकवधू = वीर बहूटी । अर्थ – कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन कर रही है। वह कहती है कि कृष्ण का ब्रज को लौटना वर्षाऋतु के समान है । इसी वर्णन का सांगरुपक द्वारा इस तरह प्रस्तुत किया गया है । कृष्ण के कानो में पड़े हुए सूर्य-जैसी चमक वाले कुंडल बिजली के समान चमकते हैं। गौओ के पैरो से उठी हुई धूलि बादलो के उमड़ने के समान प्रतीत होती है । गोपो पर वे -मोतियों को बिखेर रहे हैं, जो वर्षाकाल मे पड़ती हुई बूँदो के समान मालूम होते हैं । कृष्ण के दर्शन के लिए उमड़ी हुई ब्रजबालाओ के समूह मानो वर्षा काल मे उमड़ी हुई नदी है । जिस प्रकार बादलो मे आगमन से चन्द्रमा की

व्याख्या भाग १८६

ज्योति धूमिल पड़ जाती है, उसी प्रकार कृष्ण के सौन्दर्य के आगे बीरबहूटिय की शोभा मंद पड़ गई है। अतः मन को सुन्दर लगने वाले कृष्ण का ब्रज में आना ऐसा लग रहा है, मानो वर्षार्ऋतु आगई है । विशेष - सांगरूपक अलंकार । सवैया मोर किरीट नवीन लसै मकराकृत कुण्डल लोल की डोरनि । ज्यो रसखान घने घन मे दमकै बिनि दामिन चाप के छोरनि । मारि है जीव तो जीव बलाय विलोकि वलाय लैनन की कोरनि । कौन सुभाय सो आवत स्याम बजावत बैंनु नचावत मौरनि ॥४७॥ शब्दार्थ - किरीट = मुकुट । लसै = सुशोभित है । मकराकृत कुण्डल = मकर की आकृति के समान कुण्डल । लोल = चंचल । दमकै विवि दामिनि चाप के छोरनि = इन्द्रधनुष के दोनो सिरो पर दो बिजलियाँ दमक रही है । मारि है जीव तो जीव वलामा = यदि प्राण मार भी दिये जाये तो भी जीवन मुश्किल है; अर्थात् मरकर भी इस शोभा से छुटकारा नही मिल सकता । सुभाय = शोभा, सजधज । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखी ! कृष्ण के सिर पर मोर-पंखो का मुकुट सुशोभित है । कानो के कुण्डल, जो मकर की आकृति के समान है, अपनी डोरियो पर भूलते हुए चंचल बन रहे है । वे ऐसे प्रतीत होते है जैसे इन्द्रधनुष के दोनो सिरो पर दो बिजलियाँ दमक रही है । कृष्ण के कटाक्षो की जो शोभा है, वह इतनी घनीभूत है कि उससे मर कर भी पीछा नही छूट सकता । वह देखो, वह कृष्ण बाँसुरी बजाता हुआ और अपने मोर-मुकुट को नचाता हुआ कितनी सजधज के साथ आ रहा है । विशेष - यह छवि-वर्णन परम्परागत है । तुलना - 'चन्दन खौरि ललाट विराजत मोरपखा सिर ऊपर सोहै । कुण्डल लोल कपोल लसै मुरली के बजावत मो मन मोहै । मोहि विलोकि विलोकि हँसै चितचोर बड़े-बड़े नैनन जोहै । पूछति गोवपधू भगवन्त या साँवरो सो जमुना-तट को है ॥ -भगवन्त

१६० रसखान-ग्रन्थावली सवैया दोउ कानन कुंडल मोरपखा सिर सोहे दुकूल नयो चटको । मनिहार गरे सुकुमार धरे नट-भेस अरे पिय को तटको ॥ सुभ काछनी वैजनी पायन आवत मैन लगे भटको । वह सुन्दर को रसखानि अनी जु गलीन में आड अबै अटको ।४८। शब्दार्थ—कानन = कानो मे । मोरपखा = मोर-मुकुट । दुकूल = वस्त्र चटको = चटकीला । मनिहार = मणियो का हार । तटको = नवीन वेश । सुभ = सुन्दर । पायन = पैरो मे । आवत में = आने मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह दोनो कानो में कुंडल पहने हुए है । सिर पर मोर-पखो का मुकुट सुशोभित है । नवीन चटकीला वस्त्र धारण किये हुए है । उनके गले मे मणियो का हार है । वह प्रियतम नवीन तथा सुन्दर नट- वेश धारण किये हुए है । उसकी कमर मे सुन्दर काछनी है, पैरो मे बजने वाली पैजनी हैं जिसके कारण उसे चलने मे कोई बाधा नही होती । हे सखि ! वह सुन्दरता और आनन्द का सागर कृष्ण अब इन गलियो मे आकर ठहर गया है । विशेष—सौन्दर्य-वर्णन परम्परागत है । पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'सुभ काछनी वैजनी पै अनी पाँवन आवत मैन लगे भटको' सवैया काटे लटे की लटी लकुटी दुपटी सुफटी सोउ आवे कँधाही । भावते भेष सबै रसखान न जानिए क्यो अँखियां ललचाही । तू कछु जानत या छवि को यह कौन है साँवरिया वन माही । जोरत नैन मरोरत भौंह निहोरत सैन अमेठत बाँही ॥ ४६ ॥ शब्दार्थ —काटे लटे की = किसी वृक्ष की डाल से काटी हुई । लटी = छोटी- सी । भावते भेष = मनोहर वेश-भूषा । जोरत नैन = आँखे मिलाता है । मरोरत भौंह = भौंहो को मटकाता है । निहोरत सैन = नेत्रों के संकेतो से अनुनय-विनय करता है । अमेठत बाँही = बाँहे हिला-हिलाकर चलता है । अर्थ—कृष्ण की छवि को देखकर कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वह किसी वृक्ष की डाल से काटी हुई छोटी-सी छडी अपने हाथ मे

व्याख्या भाग १६१ लिए हुए है। उसका दुपट्टा सुन्दर है जो उसके आधे ही कंधे पर पडा हुआ है। वह मनोहर वेश-भूषा धारण किये हुए है। न जाने क्यो मेरी आँखें उसकी ओर ललचा कर आकृष्ट हो गई है। हे सखि ! क्या तुम जानती हो कि ऐसी शोभा से मुक्त, वह साँवरा युवक जो वन मे रहता है, कौन है ? वह हर किसी युवती से आँखें मिलाता है, भौंहो को मटकाता है, नेत्रो के संकेतो से अनुनय-विनय करता है और अपने हाथो को हिला-हिलाकर इतराता हुआ चलता है। विशेष—१. अंतिम पंक्ति मे विविध भावो की सुन्दर योजना है। २. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित रसखान-ग्रंथावली मे नही है। सवैया कैसो मनोहर वानक मोहन सोहन सुन्दर काम ते आली। जाहि बिलोकत लाज तजी कुल छूटौ है नैननि की चल चाली॥ अधरा मुसकान तरंग लसै रसखानि सुहाइ महाछबि छाली। कुंज गली मधि मोहन सोहन देख्यौ सखी वह रूप-रसाली ॥ ५० ॥ शब्दार्थ — वानक = वेश । काम = कामदेव । आली = सखी । चल = चंचल । अधरा = होठो पर। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का वेश अत्यन्त सुन्दर है। अपनी सुन्दरता मे वह कामदेव की सुन्दरता से भी बढ-चढकर है। उसको देखकर मैने लाज त्याग दी है और नेत्रो की चंचल गति के साथ ही कुल छूट गया है। उनके होठो पर मुसकान की लहरे सुशोभित है। वह आनन्द सागर कृष्ण अत्यधिक शोभा से सुशोभित हो रहे है। हे सखि ! मैने उस सुन्दर कृष्ण को कुंज गली के अन्दर देखा था। दोहा मोहनि छवि रसखानि लखि, अब दृग अपने नाहिं। ऐंचे आवत धनुष से, छूटे सर से जाहिँ ॥५१॥ शब्दार्थ—दृग=नेत्र। अपने नाहि=अपने वश मे नही रहे। ऐंचे=सीचने पर। सर=बाण। अर्थ—रसखान कहते है कि जब से कृष्ण की शोभा को देखा है, तब से

१६२ रसखान-ग्रन्थावली ये मेरे नेत्र मेरे वश में नहीं रहे हैं । ये कृष्ण-छवि पर से बड़ी कठिनता से धनुष की भाँति खिंचते हैं, पर बाण की तरह तेजी से फिर वहीं पहुँच जाते हैं । विशेष—उपमा अलंकार । तुलना—'हरि रहीम ऐसी करी, ज्यो कमान सर पूर । खैंचि अपनी ओर को, डारि दियो पुनि दूर ॥ —रहीम दोहा या छवि पै रसखानि अब वारौं कोटि मनोज । जाकी उपमा कविन नहिँ पाई रहे सु खोज ॥५२॥ शब्दार्थ—वारौं = न्यौछावर करता हूँ । कोटि = करोड़ो । मनोज = कामदेव सु = भली प्रकार से, तन्मय होकर । अर्थ—रसखानि कृष्ण की छवि का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मैं कृष्ण की इस शोभा पर करोड़ो कामदेव न्यौछावर करता हूँ । कृष्ण की छवि की उपमा अभी तक कवियो को नहीं मिली है और वे अब भी पूर्ण तन्मय होकर उसके लिए उचित उपमा की खोज कर रहे हैं । विशेष—अतिशयोक्ति अलंकार । प्रेमलीला कवित्त कदम करीर तरि पूछनि अधीर गोपी आनन रुखोर गरो खरोई भरोहो सो । चोर हो हमारो प्रेम-चौतरा मैं हार्यो गरावनि ते निकसि भाज्यो है करि लजैरी सो । ऐसे रूप ऐसो भेष हमें हूँ दिखैयौ, देखि देखत ही रसखानि नैननि चुभैरौँ सो । मुकुट झुकोहो हास हियरा हरौहो कटि, फेटा पिपरोहो अगरग साँवरौहो सो ॥५३॥ शब्दार्थ—तीर = किनारा गरावनि = बंधन । पिपरोहौँ = पीला ।

व्याख्या भाग १६३ अर्थ—कोई व्याकुल गोपी यमुना के किनारो से, कदम्ब तथा करील के वृक्षों से पूछती है कि तुम्हारे साथ रहने वाला वह कृष्ण कहाँ चला गया जिसका मुख मलीन है ग्रीवा अत्यन्त भरी हुई है, अर्थात् पुष्ट है । वह प्रेम रूपी खेल मे हारा हुआ हमारा चोर है जो लज्जित-सा होकर हमारे बघन (फदे) से निकल कर भाग गया है । अत्यन्त सुन्दर रूप और केश को हमे दिखाने वाला, जिसे देखते उसका सौन्दर्य आँखो मे गड गया, वह कृष्ण कहाँ है ? उसका मुकुट झुका हुआ है, उसके हृदय पर सुन्दर हार पडा हुआ है, वह अपनी कमर मे पीला वस्त्र बाँधे हुए है और श्याम रग का है । विशेष—परोक्ष रीति से कृष्ण के सौन्दर्य का भावपूर्ण वर्णन है । सवैया भौह भरी सुथरी बरुनी अति ही अधरानि रच्यौ रग रातो । कुंडल लोल कपोल महाछबि कुंजन तै निकस्यौ मुसकातो ॥ छूटि गयौ रसखानि लखै उर भूलि गई तन की सुधि सातो । फूटि गयौ सिर तै दधि भाजन टूटिगौ नैन न लाज को नातो ॥ ५४ ॥ शब्दार्थ—सुथरी = सुन्दर । बरुनी = पलके । रग रातो = लाल रंग । लोल = चंचल । सातो = सातो इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) अर्थ—कृष्ण से भेट हो जाने पर गोपी की क्या दशा हुई, उसी का वह वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण के भौहे भरी हुई थी, पलके सुन्दर थी और अधर लाल रंग से रगे हुए-से जान पड़ते थे, अर्थात् वे लालिमा से भरे हुए थे । उसके कानो मे कुडल थे जिनकी चंचलता (हिलने-डुलने) के कारण कपोलो पर भारी शोभा व्याप्त थी । ऐसा सौन्दर्य धारी कृष्ण कुजो मे से मुसकराता हुआ निकला । उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखते ही मेरा हृदय जोर-जोर से धडकने लगा, मेरी सातो इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) अपनी सुधि-बुधि भूल गई । मै इतनी बेसुध-सी हो गई कि मुझे अपने सिर पर रखे हुए दही के मटके का भी ध्यान नही रहा और वह सिर से पृथ्वी पर गिर कर फूट गया तथा आँखो से लाज का सम्बन्ध समाप्त हो गया , अर्थात् मै नारी-सुलभ लज्जा को त्यागकर बहुत देर तक उसे निर्निमेप दृष्टि से देखती रही ।

१६४ रसखान-ग्रन्थावली सवैया जात हुती जमुना जल कों मनमोहन घेरि लयौ मग आइ कै। मोद भयौ लपटाइ लयौ पट घूँघट ढारि दयौ चित चाइ कै॥ और कहा रसखानि कहौं मुख चूमत घातन बात बनाइ कै। कैसे निभै कुल-कानि रही हिये साँवरी मूरति की छवि छाइ कै॥५५॥ शब्दार्थ-जात हुती = जा रही थी । अर्थ-काई गोपी अपनी सखी से पनघट-लीला का वर्णन करती हुई कह रही है कि हे सखि ! मैं यमुना मे पानी भरने के लिए जा रही थी कि कृष्ण ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया । प्रसन्न होकर उसने मुझे अपने शरीर से लिपटा लिया और जान-बूझकर उसने मेरे मुख पर पड़ा हुआ घूँघट हटा दिया । हे सखि ! मैं और तो क्या कहूँ, वह बाते बनाकर और अवसर निकाल कर मेरा मुख चूमने लगा । अब वंश की मर्यादा का पालन किस प्रकार हो सकता है, क्योकि मेरे हृदय मे कृष्ण की साँवरी मूर्ति की शोभा बस गई है । सवैया जा दिन ते निरख्यौ नदनंदन कानि तजी कर बंधन टूट्यौ । चारु विलोकिन कीनी सुमार सम्हार गई मन मोर ने लूट्यौ ॥ सागर को सलिला जिमि धावै न रोकी रुकै कुल को पुल टूट्यौ । मत्त भयौ मन सग फिरे रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ॥ ५६॥ शब्दार्थ-निरख्यौ = देखा । कानि = मर्यादा । चारु - सुन्दर । विलो- कनि = दृष्टि । सुमार = गहरी चोट । सम्हार = सुधि । मार = स्मर, कामदेव । सलिला = नदी । सरूप = सौन्दर्य । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से मैंने कृष्ण को देखा है, उसी दिन से मर्यादा त्याग दी है, घर का बंधन छूट गया है । उसकी सुन्दर दृष्टि ने मेरे हृदय पर गहरी चोट की है जिसके कारण मैं अपनी सुधि खो बैठी हूँ और कामदेव ने मेरे मन को लूट लिया है । जिस प्रकार नदी अपना पुल तोड़कर सागर की ओर दौड़ती है और रोके से नही रुकती, उसी प्रकार मेरे कुल की मर्यादा का पुल टूट गया है और मेरा मन प्रवाघ गति से कृष्ण की ओर दौड़ रहा है। मेरा मन पागल हो गया है और यह आनन्द-सागर कृष्ण के साथ-साथ फिरता है क्योकि इसने उनके सौन्दर्य की अमृत के आनन्द को पी लिया है।

व्याख्या भाग १६५ विशेष—दृष्टांत और रूपक अलंकार । सवैया सुधि होत विदा नर नारिन की दुति दीहि परे बहियाँ पर की । रसखान विलोकत गु ज छरानि तजै कुल कानि दुहूँ घर की । सहरात हियौ फहरात हवाँ चितवै कहरानि पितंबर की । यह कौन खरौ इतरात गहै बलि की बहियाँ छहियाँ बर की । ५७।। शब्दार्थ—बहियाँ पर की=भुजा की । गु ज छरानि=गु ज की माला को । दुहूँ घर की=दोनो घरो की—पिता तथा श्वसुर के घर की । सहराता हियो=हृदय शीतल होता है, अपार आनन्द मिलता है। फहरात हवाँ=शरीर रोमाचित होता है। बलि की=बलराम की । छहियाँ बट की=बट वृक्ष की, छाया । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का वर्णन करती हुई कहती है कि जिसकी भुजाओ की शोभा पर दृष्टि पडते ही नर-नारियो की सुधि नष्ट हो जाती है । जिनके गले मे पडी हुई गुँजो की माला को देखते ही नारियाँ अपने पिता और श्वसुर के घरो की मर्यादा को भूलकर उन्हे प्रेम करने लगती है । उनके पीले वस्त्र की फहरान को देखकर हृदय को अपार आनन्द मिलता है और सारा शरीर रोमाचित हो जाता है । हे सखि ! बताओ तो, बट-वृक्ष की छाया मे बलराम की बाँह पकडकर इतराता हुआ वह कौन खडा है ? विशेष—१. इस सवैया मे अनुभावो की योजना है । २. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली'- मे यह सवैया नही है । सवैया ए सजनी मनमोहन नागर आगर दौर करी मन माही । सास के त्रास उसास न आवत कैसे सखी ब्रजवास वसाही । माखी भई मधु की तरुनी बरुनीन के बान बिधी कित जाही । वीथिन डोलति है रसखानि रहै निज मन्दिर मे पल नाही ॥ ५८ ॥ शब्दार्थ—आगर=निधि । त्रास=भय । तरुनी=युवती । बरुनीन=पलके यहाँ वक्र-दृष्टि से तात्पर्य है । वीथिन=गलियो । मदिर=घर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की प्रेम-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सजनी ! कृष्ण अत्यन्त चतुर है । उन्होने मेरे मन मे दौड़ कर