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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 368 में से

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व्याख्या भाग १८७ वह लाल की चाल चुभी चित मै रसखानि संगीत उघट्टनि की । वह पीतपटकवनि की चटकनि लटककनि मोर मुकुट्टनि की ॥ ४३ ॥ शब्दार्थ—घेरनि = घेरना । अबेर = देर से । सबेरनि = जल्दी से । घेरनि = घुमाना । ललुकट्टनि की = लाठी का । चच्छु = चक्षु, आँख । पटकवनि की = वस्त्रो की । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण का देर से या जल्दी से गायो को घेरना, अपनी लाठी को घुमाना, आँखो के द्वारा तीक्ष्ण कटाक्ष करना , भौह और भृकुटियो की मोड़ने की शोभा, सगीत की ताने बजाना, पीले वस्त्रो की फडफडाहट और मोर-मुकुंट का लटकना, ने कृष्ण की सभी चाले मेरे मन मे घर कर गई है । विशेष—अनुभावो की सुन्दर योजना है । सवैया साँझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन मौ ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजबाम सुलाज सनेह दुरै उभकै री ॥ गोधन धूरि की धूँधरि मै तिनकी छबि यौ रसखानि तकै री पावक के गिरि ते बुधि मानौ चुँवा-लपटी लपटै ललकै री ॥ ४४ ॥ शब्दार्थ—साँझ समै = सन्ध्या के समय मे । पेखन कौ = देखने के लिए । ललकै = इच्छा करना । धूँधरि मैं = धुंधलेपन मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के रूप की शोभा इतनी आकर्षक है कि सन्ध्या के समय उसे व्रज को लौटते समय देखकर मन उसे देखने के लिए इस प्रकार प्रबल इच्छा करने लगता है कि व्रज की युवतियाँ लज्जा और प्रेम के कारण ऊँची अट्टालियो पर चढकर उभक-उभक कर इसे देखने लगती है । रसखान कहते है कि गौओ के सुरो से उठी हुई धूलि से धुँधलेपन मे कृष्ण की छवि इस प्रकार दिखाई देती है, मानो आग के पहाड से बुझकर धुँए के बादल चढे आ रहे हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार ।

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