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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१८८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया देखिक राम महावन को इक गोपवधू कह्यो एक वधू पर । देखति हौ सखि मार से गोप कुमार बने जितने ब्रज-भू पर ॥ तीछे निटारि तयौ रसखानि सिंगार करै किन कौऊ बह पर । फेरि फिरै अँखियाँ ठहरानि है कारे पिनम्बर वारे के ऊपर ॥ ५४ ॥ शब्दार्थ—मार = स्मर, काम देव । तीछे = तिरछी दृष्टि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के द्वारा रचाई गई रासलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने महावन में रासलीला रची थी। जितने भी ब्रज के गोप हैं वे सब इस प्रकार से सजे हुए थे कि वे कामदेव की भाँति दिखाई पड़ते थे । मैंने तिरछी दृष्टि से उनका देखा, वे कुछ न कुछ शृंगार किये हुए थे , अथवा विविध प्रकार के शृंगारों से सुसज्जित थे । उन्हें देखने के बाद फिर दृष्टि पीताम्बर धारीकृष्ण पर जाती थी । वे भी इतने सुशोभित हो रहे थे कि आँखें बार-बार उन्ही पर जाकर ठहरती थी । सवैया दमकैं रवि कुंडल दामिनी से धुरवा जिमि गोरज गाजत है । मुकताहल-वारन गोपन के मु ती बूँदन की छवि छाजत है ॥ ब्रजवाल नदी उमड़ी रसखानि मयकवधू-द्युति लाजत है । यह ग्रावन श्री मनभावन की वरषा जिमि आज विराजत है ॥ ४६ ॥ शब्दार्थ—रवि-कुंडल सूर्य जैसी तेज चमक वाले कुंडल । दामिनी= बिजली। धुरवा = बादलों के स्तम्भ । गोरज = गऊओं के पैरों से उठी हुई धूलि । मुक्ताहल = मोती । मयकवधू = वीर बहूटी । अर्थ – कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन कर रही है। वह कहती है कि कृष्ण का ब्रज को लौटना वर्षाऋतु के समान है । इसी वर्णन का सांगरुपक द्वारा इस तरह प्रस्तुत किया गया है । कृष्ण के कानो में पड़े हुए सूर्य-जैसी चमक वाले कुंडल बिजली के समान चमकते हैं। गौओ के पैरो से उठी हुई धूलि बादलो के उमड़ने के समान प्रतीत होती है । गोपो पर वे -मोतियों को बिखेर रहे हैं, जो वर्षाकाल मे पड़ती हुई बूँदो के समान मालूम होते हैं । कृष्ण के दर्शन के लिए उमड़ी हुई ब्रजबालाओ के समूह मानो वर्षा काल मे उमड़ी हुई नदी है । जिस प्रकार बादलो मे आगमन से चन्द्रमा की

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