रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १८६
ज्योति धूमिल पड़ जाती है, उसी प्रकार कृष्ण के सौन्दर्य के आगे बीरबहूटिय की शोभा मंद पड़ गई है। अतः मन को सुन्दर लगने वाले कृष्ण का ब्रज में आना ऐसा लग रहा है, मानो वर्षार्ऋतु आगई है । विशेष - सांगरूपक अलंकार । सवैया मोर किरीट नवीन लसै मकराकृत कुण्डल लोल की डोरनि । ज्यो रसखान घने घन मे दमकै बिनि दामिन चाप के छोरनि । मारि है जीव तो जीव बलाय विलोकि वलाय लैनन की कोरनि । कौन सुभाय सो आवत स्याम बजावत बैंनु नचावत मौरनि ॥४७॥ शब्दार्थ - किरीट = मुकुट । लसै = सुशोभित है । मकराकृत कुण्डल = मकर की आकृति के समान कुण्डल । लोल = चंचल । दमकै विवि दामिनि चाप के छोरनि = इन्द्रधनुष के दोनो सिरो पर दो बिजलियाँ दमक रही है । मारि है जीव तो जीव वलामा = यदि प्राण मार भी दिये जाये तो भी जीवन मुश्किल है; अर्थात् मरकर भी इस शोभा से छुटकारा नही मिल सकता । सुभाय = शोभा, सजधज । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखी ! कृष्ण के सिर पर मोर-पंखो का मुकुट सुशोभित है । कानो के कुण्डल, जो मकर की आकृति के समान है, अपनी डोरियो पर भूलते हुए चंचल बन रहे है । वे ऐसे प्रतीत होते है जैसे इन्द्रधनुष के दोनो सिरो पर दो बिजलियाँ दमक रही है । कृष्ण के कटाक्षो की जो शोभा है, वह इतनी घनीभूत है कि उससे मर कर भी पीछा नही छूट सकता । वह देखो, वह कृष्ण बाँसुरी बजाता हुआ और अपने मोर-मुकुट को नचाता हुआ कितनी सजधज के साथ आ रहा है । विशेष - यह छवि-वर्णन परम्परागत है । तुलना - 'चन्दन खौरि ललाट विराजत मोरपखा सिर ऊपर सोहै । कुण्डल लोल कपोल लसै मुरली के बजावत मो मन मोहै । मोहि विलोकि विलोकि हँसै चितचोर बड़े-बड़े नैनन जोहै । पूछति गोवपधू भगवन्त या साँवरो सो जमुना-तट को है ॥ -भगवन्त