भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१६० रसखान-ग्रन्थावली सवैया दोउ कानन कुंडल मोरपखा सिर सोहे दुकूल नयो चटको । मनिहार गरे सुकुमार धरे नट-भेस अरे पिय को तटको ॥ सुभ काछनी वैजनी पायन आवत मैन लगे भटको । वह सुन्दर को रसखानि अनी जु गलीन में आड अबै अटको ।४८। शब्दार्थ—कानन = कानो मे । मोरपखा = मोर-मुकुट । दुकूल = वस्त्र चटको = चटकीला । मनिहार = मणियो का हार । तटको = नवीन वेश । सुभ = सुन्दर । पायन = पैरो मे । आवत में = आने मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह दोनो कानो में कुंडल पहने हुए है । सिर पर मोर-पखो का मुकुट सुशोभित है । नवीन चटकीला वस्त्र धारण किये हुए है । उनके गले मे मणियो का हार है । वह प्रियतम नवीन तथा सुन्दर नट- वेश धारण किये हुए है । उसकी कमर मे सुन्दर काछनी है, पैरो मे बजने वाली पैजनी हैं जिसके कारण उसे चलने मे कोई बाधा नही होती । हे सखि ! वह सुन्दरता और आनन्द का सागर कृष्ण अब इन गलियो मे आकर ठहर गया है । विशेष—सौन्दर्य-वर्णन परम्परागत है । पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'सुभ काछनी वैजनी पै अनी पाँवन आवत मैन लगे भटको' सवैया काटे लटे की लटी लकुटी दुपटी सुफटी सोउ आवे कँधाही । भावते भेष सबै रसखान न जानिए क्यो अँखियां ललचाही । तू कछु जानत या छवि को यह कौन है साँवरिया वन माही । जोरत नैन मरोरत भौंह निहोरत सैन अमेठत बाँही ॥ ४६ ॥ शब्दार्थ —काटे लटे की = किसी वृक्ष की डाल से काटी हुई । लटी = छोटी- सी । भावते भेष = मनोहर वेश-भूषा । जोरत नैन = आँखे मिलाता है । मरोरत भौंह = भौंहो को मटकाता है । निहोरत सैन = नेत्रों के संकेतो से अनुनय-विनय करता है । अमेठत बाँही = बाँहे हिला-हिलाकर चलता है । अर्थ—कृष्ण की छवि को देखकर कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वह किसी वृक्ष की डाल से काटी हुई छोटी-सी छडी अपने हाथ मे