रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १६१ लिए हुए है। उसका दुपट्टा सुन्दर है जो उसके आधे ही कंधे पर पडा हुआ है। वह मनोहर वेश-भूषा धारण किये हुए है। न जाने क्यो मेरी आँखें उसकी ओर ललचा कर आकृष्ट हो गई है। हे सखि ! क्या तुम जानती हो कि ऐसी शोभा से मुक्त, वह साँवरा युवक जो वन मे रहता है, कौन है ? वह हर किसी युवती से आँखें मिलाता है, भौंहो को मटकाता है, नेत्रो के संकेतो से अनुनय-विनय करता है और अपने हाथो को हिला-हिलाकर इतराता हुआ चलता है। विशेष—१. अंतिम पंक्ति मे विविध भावो की सुन्दर योजना है। २. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित रसखान-ग्रंथावली मे नही है। सवैया कैसो मनोहर वानक मोहन सोहन सुन्दर काम ते आली। जाहि बिलोकत लाज तजी कुल छूटौ है नैननि की चल चाली॥ अधरा मुसकान तरंग लसै रसखानि सुहाइ महाछबि छाली। कुंज गली मधि मोहन सोहन देख्यौ सखी वह रूप-रसाली ॥ ५० ॥ शब्दार्थ — वानक = वेश । काम = कामदेव । आली = सखी । चल = चंचल । अधरा = होठो पर। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का वेश अत्यन्त सुन्दर है। अपनी सुन्दरता मे वह कामदेव की सुन्दरता से भी बढ-चढकर है। उसको देखकर मैने लाज त्याग दी है और नेत्रो की चंचल गति के साथ ही कुल छूट गया है। उनके होठो पर मुसकान की लहरे सुशोभित है। वह आनन्द सागर कृष्ण अत्यधिक शोभा से सुशोभित हो रहे है। हे सखि ! मैने उस सुन्दर कृष्ण को कुंज गली के अन्दर देखा था। दोहा मोहनि छवि रसखानि लखि, अब दृग अपने नाहिं। ऐंचे आवत धनुष से, छूटे सर से जाहिँ ॥५१॥ शब्दार्थ—दृग=नेत्र। अपने नाहि=अपने वश मे नही रहे। ऐंचे=सीचने पर। सर=बाण। अर्थ—रसखान कहते है कि जब से कृष्ण की शोभा को देखा है, तब से