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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१६२ रसखान-ग्रन्थावली ये मेरे नेत्र मेरे वश में नहीं रहे हैं । ये कृष्ण-छवि पर से बड़ी कठिनता से धनुष की भाँति खिंचते हैं, पर बाण की तरह तेजी से फिर वहीं पहुँच जाते हैं । विशेष—उपमा अलंकार । तुलना—'हरि रहीम ऐसी करी, ज्यो कमान सर पूर । खैंचि अपनी ओर को, डारि दियो पुनि दूर ॥ —रहीम दोहा या छवि पै रसखानि अब वारौं कोटि मनोज । जाकी उपमा कविन नहिँ पाई रहे सु खोज ॥५२॥ शब्दार्थ—वारौं = न्यौछावर करता हूँ । कोटि = करोड़ो । मनोज = कामदेव सु = भली प्रकार से, तन्मय होकर । अर्थ—रसखानि कृष्ण की छवि का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मैं कृष्ण की इस शोभा पर करोड़ो कामदेव न्यौछावर करता हूँ । कृष्ण की छवि की उपमा अभी तक कवियो को नहीं मिली है और वे अब भी पूर्ण तन्मय होकर उसके लिए उचित उपमा की खोज कर रहे हैं । विशेष—अतिशयोक्ति अलंकार । प्रेमलीला कवित्त कदम करीर तरि पूछनि अधीर गोपी आनन रुखोर गरो खरोई भरोहो सो । चोर हो हमारो प्रेम-चौतरा मैं हार्यो गरावनि ते निकसि भाज्यो है करि लजैरी सो । ऐसे रूप ऐसो भेष हमें हूँ दिखैयौ, देखि देखत ही रसखानि नैननि चुभैरौँ सो । मुकुट झुकोहो हास हियरा हरौहो कटि, फेटा पिपरोहो अगरग साँवरौहो सो ॥५३॥ शब्दार्थ—तीर = किनारा गरावनि = बंधन । पिपरोहौँ = पीला ।