रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—कानन लौ = कानो तक। आनन = मुख । कौतुक = खेल । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि उनके दोनो नेत्र कानो तक खिंचे रहते है ; अर्थात् उनके नेत्र विशाल है , उनके केश मुख पर लहराते रहते हैं उनकी सुन्दर शोभा की कांति बिखर कर करोडो प्रकार के खेल दिखा रही है। उसकी शोभा झुककर, घूमकर और, अमृत को चूमकर चन्द्रमा की चाँदनी को चुरा रही है । रसखान कहते हैं कि कृष्ण की महा छवि मनमोहक है, इसीलिए वह मन को तरसा रही है। विशेष —द्वितीय और तृतीय पंक्ति मे छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास । सवैया लाल लसै पगिमा सब के सबके पट कोटि सुगवंधि भीने । अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने ॥ मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुंवार सिंगार सो कीने । पै सिगरे ब्रज के हरि ही हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥ ४२ ॥ शब्दार्थ—कोटि = करोड़ । जराउ = आभूषण । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सारे ग्वालो के सिर पर लाल पगड़ी सुशोभित है, सभी के वस्त्र करोड़ों प्रकार की सुगन्धियो से सुगन्धित हो रहे है । रसखान कहते है कि सभी के अंग अनेक प्रकार के आभूषणो से सुशोभित है । सभी के गलो मे मोतियो की मालाये सुशोभित हैं, सारे युवक ग्वाल शृंगार किये हुए हैं, किन्तु श्रीकृष्ण सारे ब्रज के सिंह हैं । अर्थात् सभी मे श्रेष्ठ है । उन्होने अपने हृदय पर पड़ी हुई लहलहाती वनमाला से ही सबके हृदय अपने वश मे कर लिए । विशेष—अंतिम पंक्ति मे यमक अलंकार । सवैया वह घेरनि धेनु अवेर सबेरनि फेरनि लाल लकुट्टनि की । वह तीछन चच्छु कटाछन की छवि मोरनि भौह भृकुट्टनि की ॥