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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग १८५ स्थल पर पड़ी हुई छवि की भाँति विलक्षण है। हे सखि ! मैने उसको (कृष्ण को) पेड़ की डालियाँ पकड़ कर खड़े हुए देखा था। उस समय उसकी जो शोभा थी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसकी रस से भरी हुई मुस- कान मेरे हृदय मे और मन मे भर गई है। उसको छूटने की मुझे कौन शिक्षा दे सकती है ? अर्थात् किसी के कहने से भी वह नहीं छूट सकती। पाठान्तर—'अलबेली विलोकनि बोलनि है अलबेली सु लोलनि हारन की। अलबेली सी डोलनि गडनि पै छवि कुंडल सो मिलि बारन की। भटू ठाढो लख्यो छवि कैसे कहौ रसखान गहै द्रुम डारन की। हिय मे जिय मे मुसकानि रमी गति को सिखवै निरवारन की॥' सवैया बाँकी बड़ी अँखियाँ बडरारे कपोलनि बोलनि कौ कल बानी। सुन्दर रासि सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ॥ ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी। डोलति है बन बीथिन मै रसखानि मनोहर रूप-लुभानी ॥ ४० ॥ शब्दार्थ—बडरारे = बड़े, विशाल। कल = सुन्दर। सुधानिधि = चन्द्रमा। सुधारस-सानी = अमृत से युक्त। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से किसी अन्य नवीन गोपी का, जो कृष्ण से प्रेम करती है, वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । जब से उस नवीन गोपी ने अत्यन्त सुख देने वाले, वक्र तथा विशाल नेत्र वाले, पुष्ट कपोल वाले मधुर भाषण करने वाले, सुन्दर हँसी वाले, चन्द्रमा के समान मुख वाले और अमृत जैसे प्रेम से युक्त शरीर वाले कृष्ण को देखा है, तब से वह उनकी खोज मे वनो मे और गलियो मे घूमती फिर रही है तथा उनके मनोहर रूप पर लुब्ध हो गये है। विशेष—द्वितीय पंक्ति मे उपमा अलंकार। सवैया दृग इने खिंचे रहैं कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही । छकि छैल छबील छटा छहराइ कें कौतुक कोटि दिखाइ रही ॥ झुकि भूमि झमाकनि चूमि भ्रमी चरि चाँदनी चन्द चुराइ रही। मन भाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही ॥ ४१ ॥