रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ रसखान ग्रन्थावली सवैया नैननि वक्र विसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली । बेधत हैं हिय तीछन कोर सुमार गिरी तिय कोटिक हेली ॥ छोरै नहीं छिनहूँ रसखानि सु लागी फिरै द्रुम सो जनु बेली । रोरि परी छवि की ब्रजमण्डल कुंडल गंडनि कुंतल केली ॥३८॥ शब्दार्थ—नवेली=नई, युवती । सुमार=भयंकर मार से । कोटिक= करोड़ों । हेली=सखी । द्रुम=वृक्ष । रोरि=कोलाहल । कुंडल गंडनि कुन्तल केली=कुंडल से सुशोभित गंडस्थल पर केशों की क्रीड़ा । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! ऐसी कोई भी युवती नहीं है जो कृष्ण के वक्र एवं विशाल नेत्र-रूपी बाणों की चोट को सह सके । ये बाण अपनी तीक्ष्ण नोकों से हृदय को बेधते हैं और करोड़ों नारियाँ इनकी भयंकर मार से गिर गई हैं । आनन्द-सागर कृष्ण फिर उन नारियों से क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़े जाते और वे उनसे उसी प्रकार चिपट जाती हैं जिस प्रकार वृक्ष से बेल लिपट जाती है । सारे ब्रज में कृष्ण की शोभा तथा उनके कुंडल से सुशोभित गंडस्थल पर केशों की क्रीड़ा का कोलाहल मचा हुआ है । विशेष—रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार । सवैया अलवेली विलोकनि बोलनि औ अलवेलियै लोल निहारन की । अलवेली सी डोलनि गंडनि पै छवि सो मिली कुंडल वारन की ॥ भटू ठाढ़ी लख्यौ छवि कैसे कहौं रसखानि गहे द्रुम डारन की । हिय मै जिय मै मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥३९॥ शब्दार्थ—अलवेली=विलक्षण । विलोकनि=दृष्टि । लोल=चंचल । गंडनि पै=गंडस्थलों पर । वारन=हाथी । द्रुम=वृक्ष । निरवारन की= छूटने की । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसकी दृष्टि और वाणी विलक्षण हैं; उसकी चंचल दृष्टि भी विलक्षण-सी है । उसके कपोलों पर कुंडलों की छवि हाथी के गड-