रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १८३
विशेष—रूपक अलंकार । पाठान्तर—इस सवैये की दूसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— ‘वह नैन की कोर कटाछन लाय कै लाज की ग्रथनि खोलत है ।’ तुलना—‘चित्त चप जाय परे सोभा के समुद्र माँझ, रही न सभार कछु और भई पल मे । मन मेरो गरूवो गयौ री बूडि मै न पायौ, नैन मेरे हरूवे तिरत रूप जल मे ।’ गंग कवि सवैया तै न लख्यौ जब कुंजनि ते बनिकै निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री ॥ को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रज लोग फिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरि वा नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ॥३७॥ शब्दार्थ—बनिकै=सुन्दर रूप धारण करके । हरा=हार । किरीट= मुकुट । भटक्यौ=रूप से झकझोरा हुआ । हटक्यौ=मना करने पर भी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! तब कृष्ण भटकता हुआ और मटकता हुआ सुन्दर रूप धारण करके कुंज मे से निकाला था, तब तूने उसे नही देखा । उसके हृदय पर पड़ा हुआ हार कितना शोभायमान था और सिर पर लटकता हुआ मुकुट कितना सुन्दर दिखाई पड रहा था । रसखान कहते है कि ब्रजवासियो के मना करने पर भी वह रूप से झकझोरा हुआ कृष्ण भटकता हुआ फिर रहा था । उस नटवर कृष्ण का सारा सौन्दर्य मेरे हृदय मे अटक गया है, अर्थात् उसके सौन्दर्य का गम्भीर प्रभाव मेरे हृदय पर पड़ा है । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे ‘अटक्यौ’ शब्द की तीन बार आवृत्ति प्रभाव- शीलता मे सहायक है । वीप्सा अलंकार । पाठान्तर—इस सवैये की अन्तिम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— ‘रूप सबै हरि वा नट को हियरे फटक्यौ भटक्यौ अटक्यौ री ।’