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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 368 में से

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१८२ रसखान-ग्रन्थावली कदम विटप के निकट तटनी के तट, अटा चढि चाटि पीत पट फहरानि री । रस वरसावै तन तपनि बुझावै नैन, प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥३५॥ शब्दार्थ—लहलही = सुन्दर । विटप = वृक्ष । तटनी =-नदी, यमुना नदी । रस = आनन्द । तन-तपनि = शरीर के दुख । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि उसके मस्तक पर गोरज तथा हृदय पर सुन्दर बनमाला सुशोभित है । उसके आगे आगे गाये है, पीछे-पीछे ग्वाले है। गायो और ग्वालो के मध्य मे वह मनोहर बांसुरी बजा रहा है। जितनी सुन्दर बासुरी की ध्वनि है, उतनी ही सुन्दर उसकी वक्र चितवन और मन्द हंसी है। वह यमुना नदी के तट पर कदम्ब वृक्ष के पास है। हे सखि ! यदि तू उसके पीले वस्त्रों के फहराने को देखना चाहती है तो अटारी पर चढकर देख ले। आनन्द की वर्षा करता हुआ, शरीर के दुखो को नष्ट करता हुआ तथा नेत्र और प्राणों को मोहित करता हुआ वह आनन्द-सागर कृष्ण आ रहा है। सवैया अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गांठन खोलत है ॥ सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है । रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है ॥३६॥ शब्दार्थ—महामृदु = अत्यन्त मधुर । बूडि गयौ = डूब गया । मधि = मध्य मे, अन्दर । कलोलत है = किल्लोले करता है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण अत्यन्त सुन्दर है और वे अत्यन्त मधुर वाणी बोलते है । वे मुझे देखकर अपने नेत्रो की कोरो से कटाक्ष चलाकर लाज को दूर कर देते है, अर्थात् उनसे इतना प्रेम हो जाता है कि लोक-लाज की कोई चिन्ता नही रहती । हे सजनी ! सुनो, वह विलक्षण कृष्ण प्रत्येक कुंज मे घूमता रहता है । उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर मेरा मन उसके रूप- सागर मे डूबकर किल्लोले करता है ।

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