रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १८१ पाठान्तर—इस सवैया का यह रूप भी मिलता है— 'मोतिन माल हिये लटकै लटकै लट चौलट घूँघरवारी । अंगनि अंग जराव कसे यह सीस लसै पगिया जरतारी । पूरव पूरे ही पुन्यनि ते रसखान ये मूरति नैन निहारी । चारौ दिसा के महा अघ हाँके जो झाँके झरोवनि बाँके विहारी ॥ सवैया आवत है बन ते मनमोहन गाइन सग लसै ब्रज-ग्वाला । बेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगौ कछु ख्याला ॥ हेरत टेरि ककै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन ते ब्रज-वाला । देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्योस को ताप-कसाला ॥३४॥ शब्दार्थ—गाइन = गायो के । लसै = सुशोभित हो रहे है । अभीत = निडर होकर । ख्याला = खेल । द्योस = दिन । ताप-कसाला = थकान । अर्थ— श्रीकृष्ण गाये चराकर शाम को बन से ब्रज लौट रहे है । गायों के साथ ब्रज के ग्वाले सुशोभित हो रहे है । बंशी बजाते हुए गोचारण के गीत गाते हुए निडर होकर कृष्ण इधर कुछ खेल-सा कर गये है । उन्हे देखने के लिए चारो ओर से ब्रजवालाये आकर झरोखो से झाँकने लगी है । रसखान कवि कहते है कि उनके मुख की शोभा को देखकर सारी ब्रज-वनिताएँ अपनी दिन-भर की थकान को भूल गई, अर्थात् उनके जीवन मे नवीन चेतना और स्फूर्ति आ गई । पाठान्तर—'आवत है वन ते मनमोहन गाइन सग लसै ब्रज-ग्वाला । बेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगौ कछु ख्याला । हेरत टेर थकी चहुँ ओर तै झाँकि झरोकनि सो ब्रजवाला । देखत आनन को रसखान तज्यौ सब द्यौस को ताप कसाला ॥' कवित्त गोरज विराजै भाल लहलही बनमाल, आगे गैयाँ पाछे ग्वाल गावै मृदु तानि री । तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर मधुर जैसी, बंक चितवनि मन्द मन्द मुसकानि री ।