रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १७६ कहते है। छौनहिं=पुत्र को, कृष्ण को। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मै आज ही प्रात.काल नन्द के उस भवन मे गई थी जहाँ रस के सागर कृष्ण थे। मैं उन्हे देखते ही उनमे अनुरक्त हो गई। उन जैसा पुत्र पाकर यशोदा जी को जो सुख मिला है, उसका वर्णन नही किया जा सकता। मै तो भगवान् ने प्रार्थना करती हूँ कि उनका पुत्र लाख करोड युगो तक जीवित रहे। यशोदा जी ने उसके सिर पर तेल लगाकर और आँखों मे काजल लगाकर तथा उसकी भौहो को सँवार कर उसके मुख पर डिठौना लगा दिया। उसके गले मे हमेल और हार डालकर यशोदा जी उनके सौन्दर्य को निहारती रही, उस पर स्वय को न्यौछावर करती रही और उसे चूमती रही। विशेष—'डालि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यो चुचकारत छौनहि' के दोनो पदो मे यमक अलकार है। सवैया— धूरि भरे अति सोभित स्यामजू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी। वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज कोटी। काग के भाग बडे सजनी हरि-हाथ सो लै गयौ माखन-रोटी ॥३२॥ शब्दार्थ—धूरि भरे=धूल से सने हुए। पीरी=पीली। वारत= न्यौछावर करती है। काम=कामदेव। कला=सुन्दरता। कोटी=कोटि, करोड़ो। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुन्दरता का वर्णन करती हुई कहती है कि धूल से सने हुए शरीर वाले श्री कृष्ण अत्यन्त शोभायमान थे। ऐसी ही शोभा से युक्त उनके सिर की सुन्दर चोटी बनी हुई थी। वे खेलते हुए और माखन-रोटी खाते हुए अपने आगन मे घूम रहे थे। उनके पैरो की पैजनी बज रही थी। वे पीली लगोटी पहने हुए थे। उनकी उस समय की शोभा को देखकर कामदेव भी अपनी करोडो सुन्दरताओ को उस पर न्यौछावर कर रहा था। हे सखि ! उस कौवे का बहुत बडा सौभाग्य है