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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१७८ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—'ता' जसुदा कह्यो घेनु की ओट=यशोदा ने कृष्ण को खिलाते समत गाय की ओट मे होकर 'ता' शब्द कहा । ढिंढोरत ताहि=यशोदा को ढूंढ़ते हैं। रज मांहि विथूरि दुकूलै=अपने वस्त्रों को धूल से लथपथ कर लेते हैं। उर भाल तें=मस्तक के बीच से। वार लूतलैं=लम्बे-लम्बे बाल। अर्थ—कृष्ण की बाल-लीला का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! कृष्ण को खिलाने के लिए यशोदा ने गाय की ओट मे होकर 'ता' शब्द कहा जिसे सुनकर कृष्ण अपनी और बातों को भूलकर उन्हे ढूढते हैं। वे उन्हे ढूढने के लिए कुछ ही पग चलते हैं, किन्तु यशोदा को न पाकर वे मचल जाते हैं और पृथ्वो पर लोट-लोटकर अपने वस्त्रो को धूल से लथपथ कर लेते हैं। तब यशोदा उनके पास आती हैं। उन्हें देखकर कृष्ण हँसने लगते है और यशोदा उनके मस्तक पर पड़े हुए लम्बे-लम्बे बालों को हटाकर उनका मुह चूम लेती हैं। इस शोभा को देखकर नन्द इतने प्रसन्न होते हैं कि उनकी प्रसन्नता उनके अंगो मे नही समा पाती । विशेष—१. बाल-लीला का अत्यन्त स्वाभाविक वर्णन है । २. अन्तिम पंक्ति मे यमक अलंकार है । ३ श्री विश्वनाथ मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' में यह सवैया नही है । तुलना—'गैया की सुओट ह्वै ललैया बिलुकैया दै दै, जसोमति मैया जबै कन्हैया सो 'ता' कहै।' —अज्ञात सवैया— आजु गई हुती भोर ही हों रसखान रई वटि नन्द के भौनहिं । वाकौ जियो जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यो नहिं । तेल लगाइ लगाइ कै अँजन भौंहे बनाइ बनाइ डिठौनहिं । डांलि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यौं चुचकारत छौनहिं ॥३१॥ शब्दार्थ—रई=अनुरक्त हो गई। भौनहिं=भवन में । जुग=युग। अंजन=काजल । डिठौनहिं=डिठौने को; अपने पुत्र को नजर से बचाने के लिए माताएं उनके मुख पर काजल का काला दाग लगा देती हैं, जिसे डिठौना