रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १७७ नाचत बाल बड़े रसखान छके हित काहू के लाज न आवत । तैसोइ मात पिताउ लह्यौ उलह्यौ कुल ही कुलही पहिरावत ॥२६॥ शब्दार्थ—लाल=कृष्ण। छठी=जन्म के छठे दिन का उत्सव । अन्ह- वावत=स्नान कराते है । चाइन=चाव से । चारु=आनन्दपुर । छके हित= प्रेम मे मस्त । उलह्यौ=आनन्द । कुल ही=सारा परिवार ही । कुल ही= एक प्रकार की टोपी । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छठी-उत्सव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज कृष्ण के जन्म के छठे दिन का उत्सव है । सारे ब्रज के लोग आनन्द से भरे हुए है । नन्द अत्यन्त आनन्दित होकर कृष्ण को स्नान करा रहे है । लोग चाव से तथा चारो ओर से आनन्दप्रद बधाइया लेकर आ रहे हैं । कुटुम्ब मगल-गीत गाता हुआ तृप्त नही हो रहा है । इच्चे और बड़े सभी आनन्द-सागर कृष्ण के प्रेम से इतने मस्त होकर नाच रहे है कि उन्हे किसी प्रकार की लज्जा का अनुभव नही हो रहा है। इसी प्रकार का आनन्द माता यशोदा और पिता नन्द को भी प्राप्त हो रहा है । सारा परिवार उन्हे कुलही पहिना रहा है । विशेष—१. अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । तुलना—'आजु भोर तमचुर के दोल । गोकुल मे आनन्द होत है, मगल-धुनि महराने टोल । फूले फिरत नन्द अति सुख भयौ, हरषि मगावत फूल-तमोल । फूली फिरति जसोदा तन-मन, उबटि कान्ह अन्हवाइ अमोल ।' —सूरदास सवैया 'ता' जसुदा कह्यो धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरै हरि भूलै । ढूँढन कूँ पग चारि घलै मचलै रज माँहि विथूरि दुकूलै । हेरि हंसे रसखान तबै उर भाल तै टारि कै बार लटूलै । सो छवि देखि अनन्दन नन्दजू अंगन अंग समात न कूलै ॥३०॥