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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग १६५ विशेष—दृष्टांत और रूपक अलंकार । सवैया सुधि होत विदा नर नारिन की दुति दीहि परे बहियाँ पर की । रसखान विलोकत गु ज छरानि तजै कुल कानि दुहूँ घर की । सहरात हियौ फहरात हवाँ चितवै कहरानि पितंबर की । यह कौन खरौ इतरात गहै बलि की बहियाँ छहियाँ बर की । ५७।। शब्दार्थ—बहियाँ पर की=भुजा की । गु ज छरानि=गु ज की माला को । दुहूँ घर की=दोनो घरो की—पिता तथा श्वसुर के घर की । सहराता हियो=हृदय शीतल होता है, अपार आनन्द मिलता है। फहरात हवाँ=शरीर रोमाचित होता है। बलि की=बलराम की । छहियाँ बट की=बट वृक्ष की, छाया । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का वर्णन करती हुई कहती है कि जिसकी भुजाओ की शोभा पर दृष्टि पडते ही नर-नारियो की सुधि नष्ट हो जाती है । जिनके गले मे पडी हुई गुँजो की माला को देखते ही नारियाँ अपने पिता और श्वसुर के घरो की मर्यादा को भूलकर उन्हे प्रेम करने लगती है । उनके पीले वस्त्र की फहरान को देखकर हृदय को अपार आनन्द मिलता है और सारा शरीर रोमाचित हो जाता है । हे सखि ! बताओ तो, बट-वृक्ष की छाया मे बलराम की बाँह पकडकर इतराता हुआ वह कौन खडा है ? विशेष—१. इस सवैया मे अनुभावो की योजना है । २. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली'- मे यह सवैया नही है । सवैया ए सजनी मनमोहन नागर आगर दौर करी मन माही । सास के त्रास उसास न आवत कैसे सखी ब्रजवास वसाही । माखी भई मधु की तरुनी बरुनीन के बान बिधी कित जाही । वीथिन डोलति है रसखानि रहै निज मन्दिर मे पल नाही ॥ ५८ ॥ शब्दार्थ—आगर=निधि । त्रास=भय । तरुनी=युवती । बरुनीन=पलके यहाँ वक्र-दृष्टि से तात्पर्य है । वीथिन=गलियो । मदिर=घर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की प्रेम-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सजनी ! कृष्ण अत्यन्त चतुर है । उन्होने मेरे मन मे दौड़ कर