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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१६६ रसखान-ग्रन्थावली ली है, अर्थात् मेरे मन मे समा गये है। सासु के डर से मुझे तो साँस भी नही आते। इस विषम स्थिति मे, तुम्ही बताओ, मैं ब्रज मे किस प्रकार रह सकती हूँ ? अर्थात् ब्रज मे रहना मेरे लिए एक विकट समस्या बन गया है। ब्रज की सारी युवतियाँ शहद की मक्खियाँ बनी हुई है, क्योकि जिस प्रकार शहद की मक्खी अपने ही बनाये हुए शहद मे फँस जाती है, उसी प्रकार सारी ब्रज-युव- तियाँ अपने ही किये हुए प्रेम मे फँसी हुई है। वे सब कृष्ण की वक्र-दृष्टि के बाण से विंधी हुई है। उन्हे पता नही कि वे किधर जाये, अर्थात् कृष्ण के प्रेम में पडकर वे किंकर्त्तव्य-विमूढ बन गई है। वह आनन्द-सागर कृष्ण पलभर के लिए भी अपने घर नही ठहरता, बल्कि सदैव ब्रज की गलियो मे घूमता रहता है। सवैया सखि गोधन गावत हो इक ग्वार लख्यौ वहि डार गहे वट की। अलकावलि राजति भाल विसाल लसै वनमाल हिये तटकी। जब ते वह तानि लगी रसखानि निवारै को या मग हौ भटकी। लटकी लट मो दृग-मीननि सो वनसी जियवा नट की अटकी॥ ५६ ॥ शब्दार्थ —इक ग्वार = एक ग्वाला, कृष्ण। वट = वृक्ष। अलकावलि = के- शराशि। निवारै = रोकना। बनसी = बसी, मछली को पकडने का काँटा। अर्थ —कोई गोपी अपनी सखि से कृष्ण के सौन्दर्य का तथा तज्जन्य प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! गोचारण का गीत गाते हुए मैंने कृष्ण को उसी वृक्ष की डाल पकडकर खडे हुए देखा था, जिस वृक्ष की डाल को वे प्राय पकड़ा करते हे। उनके विशाल मस्तक पर केशरिया तथा हृदय पर वनमालः सुशोभित थी। जब से उस आनन्द-सागर कृष्ण की बसी की तान मैने सुनी है, तब से कोई भी मुझे उसके प्रभाव से नही रोक सका है और मैं प्रत्येक मार्ग पर उसकी खोज के लिए भटकती फिर रही हूँ। उस नटनागर कृष्ण की लट- कती हुई लटे मेरी आँख रूपी मछलियो के लिए मछलियो पकड़ने वाला काँटा बन गई है। विशेष —अंतिम पंक्ति मे रूपक अलकार। सवैया गाइ सुहाइ न या पै कहुँ, न कहूँ यह मेरी गरी निकर्यो है। धीरसमीर कलिन्दी के तीर खर्यो रटे आजु री डीठि पर्यो है॥