रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १६७ जा रसखानि बिलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अंग ढर्यौ है। गाइन घेरतर हेरत सो पट फेरत टेरत आनि पर्यौ है ॥६० ॥ शब्दार्थ—धीरसमीर = वृन्दावन के एक कुंज का नाम। कलिन्दी = यमुना। तीर = तट। डीठि पर्यौ है = दिखाई दिया है। ढारि राँग सो अंग ढर्यौ है = ढले हुए राँग की भाँति शरीर ढल गया है, अर्थात् शरीर बहुत ही शिथिल हो गया है। आनि पर्यौ है = हृदय मे बस गया है। अर्थ—कृष्ण की सुन्दरता और उसके प्रति अपना आकर्षण व्यक्त करती हुई कोई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मैने कभी कृष्ण पर अपनी गाय का दूध भी नही निकलवाया, न कभी वह मेरी गली से होकर ही निकला है जिसके कारण इससे मेरा पहला परिचय हो। मुझे तो वहाँ आज ही यमुना के तट पर धीरसमीर कुंज मे खडा हुआ दिखाई दिया है। आनन्द के सागर उस कृष्ण को देखते ही प्रेमाकर्षण के कारण मेरा सारा शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया है। गायो को घेरता हुआ, मेरी ओर देखता हुआ, अपने वस्त्रो को सँभालता हुआ और पुकारता हुआ, अपनी इन रमणीय मुद्राओं के कारण वह मेरे हृदय मे बस गया है। विशेष—१. प्रेमाकर्षण का वर्णन स्त्री-सुलभ रीति से हुआ है। २. अन्तिम पंक्तियो मे अनेक मुद्राओ के संकेत से घटना साकार हो गई है। ३ 'ढरि राँग सो अंग ढर्यौ है' मे उपमा अलंकार है। सवैया खंजन मीन सरोजन को मृग को मद गंजन दीरघ नैना। क जन ते निकस्यौ मुसकात सु पान पर्यौ मुख अमृत चैना ॥ जाइ रटे मन प्रान बिलोचन कानन मे रुचि मानत चैना। रसखानि कर्यौ घर मो हिय मे निसिवासर एक पलौ निकसे ना ॥६१॥ शब्दार्थ—सरोजन को = कमल को। मद = घमण्ड। गंजन = चूर-चूर करना। कानन मे = बन मे। निसिवासर = रात-दिन। अर्थ—एक गोपी की कृष्ण से भेट हो गई है। उसी का वर्णन करती हुई वह अपनी सखी से कह रही है कि कृष्ण के विशाल नेत्र खंजन, मीन, कमल और मृग के घमण्ड को भी चूर-चूर करने वाले है। ऐसे सुन्दर नेत्रो वाला कृष्ण कुंजो से मुसकराता हुआ बाहर आया। उसके अधरो पर मुख में