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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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लगे हुए पान की लाली थी और उसकी वाणी अमृत के समान सुख देने वाली थी। उसे देखते ही मेरा मन और मेरे प्राण मेरे वश मे नही रहे। ये उसी वन मे बसने मे ही अपना आनन्द मानते है जहाँ कृष्ण से भेट हुई थी। रसखान कवि कहते हैं कि वह गोपी अपनी सखी से कहने लगी कि कृष्ण ने तो मेरे हृदय मे अपना घर ही कर लिया है और रात-दिन एक पल के लिए भी वह बाहर नही निकलता। विशेष—तृतीय पंक्ति मे विरोधाभास अलकार है। दोहा मन लीनो प्यारे चितै, पै छटाँक नहिं देत। यहै कहा पाटी पढी, दल को पीछो लेत ॥ ६२ ॥ शब्दार्थ—मन = हृदय, चालीस सेर। छटाँक = कटाक्ष, सेर का सोलहवाँ भाग। पाटी पढि = सीखा। दल को पीछो = ले, लेना। अर्थ—कृष्ण की चतुराई का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि हे कृष्ण तुम अपनी छवि दिखाकर मन को तो ले लेते हो, पर उसके बदले कटाक्ष नही देते, अर्थात् तुम दूसरो को ही अपने ऊपर रिझाते हो, स्वय नही रीझते। तुमने यह कहाँ से सीखा है कि केवल लेना ही जानते हो, देना नही। द्वितीय अर्थ—प्रथम पंक्ति का द्वितीय अर्थ यह होगा— हे प्यारे! तुम बहका कर चालीस सेर तो ले लेते हो, पर उसके बदले मे सेर का सोलहवाँ भाग भी नही देते। विशेष—श्लेष अलकार। तुलना—१ 'यह कौन धौ पाटी पढे हौ लला मन लेहु पै देत छटाँक नही।' —घनानन्द २ 'साहु कहावत फिरत है, चित सरसाये चाव। तेरे नैन दिवालिया, मन ले देत न पाव ॥ —रसनिधि दोहा मो मन मानिक ले गयौ, चितै चोर नँदनद। अब बेमन मै क्या करूँ, परी फेर के फन्द ॥ ६३ ॥ शब्दार्थ—वेमन = मन रहित, उदास। फेर = दुख। फद = बधन।