रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १६६ अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरे मन रूपी मोती को चित्तचोर कृष्ण चुरा कर ले गया है। अब मैं उदास हूँ। मैं तो वियोग दुख के बन्धन मे बंध गई हूँ । विशेष—अनुप्रास और रूपक अलंकार । दोहा नैन दलालनि चौहटे, मन मानिक पिय हाथ । रसखाँ ढोल बजाइके, बेच्यौ हिय जिय साथ ॥ ६४ ॥ शब्दार्थ—दलालनि = दलालो ने । चौहाटे = चौक मे, बाजार मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि इन नेत्र-रूपी दलालो ने मेरे हृदय को बीच बाजार मे बेच दिया, कृष्ण ने मेरे प्राणो को अपने वश मे कर लिया । इस प्रकार मैने ढोल बजाकर (प्रकट रूप से) अपने मन और प्राणो को बेच दिया है। विशेष—१. रूपक अलंकार । २ द्वितीय पक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग । सोरठा प्रीतम नन्दकिशोर, जा दिन ते नेननि लग्यौ । मन पावन चित चोर, पलक ओट नहि सहि सकौ ॥ ६५ ॥ शब्दार्थ—जादिन ते नेननि लग्यौ = जिस दिन से देखा है। पलक ओट = निमिष भर के लिए भी । अर्थ—कोई गोपी अपने प्रेम को अपनी सखी से प्रकट करती हुई कह रही है कि जिस दिन से मुझे प्रियतम कृष्ण दिखाई दिये है, उसी दिन से उस मन-भावन और चितचोर के वियोग को मै एक पल के लिए भी सहन नही कर पाती । बंक बिलोचन सवैया मैन मनोहर नैन बडे सखि सैननि ही मनु मेरो हर्यौ है । गेह को काज तज्यौ रसखानि हिये ब्रजराजकुमार अर्यौ है ॥ आसन-वासन सास के आसन पाने न सासन र ग पर्यौ है । नेननि बक बिसाल की जोहनि मत्त महा मन मत्त कर्यौ है ॥ ६६ ॥