भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

व्याख्या भाग १६६ अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरे मन रूपी मोती को चित्तचोर कृष्ण चुरा कर ले गया है। अब मैं उदास हूँ। मैं तो वियोग दुख के बन्धन मे बंध गई हूँ । विशेष—अनुप्रास और रूपक अलंकार । दोहा नैन दलालनि चौहटे, मन मानिक पिय हाथ । रसखाँ ढोल बजाइके, बेच्यौ हिय जिय साथ ॥ ६४ ॥ शब्दार्थ—दलालनि = दलालो ने । चौहाटे = चौक मे, बाजार मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि इन नेत्र-रूपी दलालो ने मेरे हृदय को बीच बाजार मे बेच दिया, कृष्ण ने मेरे प्राणो को अपने वश मे कर लिया । इस प्रकार मैने ढोल बजाकर (प्रकट रूप से) अपने मन और प्राणो को बेच दिया है। विशेष—१. रूपक अलंकार । २ द्वितीय पक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग । सोरठा प्रीतम नन्दकिशोर, जा दिन ते नेननि लग्यौ । मन पावन चित चोर, पलक ओट नहि सहि सकौ ॥ ६५ ॥ शब्दार्थ—जादिन ते नेननि लग्यौ = जिस दिन से देखा है। पलक ओट = निमिष भर के लिए भी । अर्थ—कोई गोपी अपने प्रेम को अपनी सखी से प्रकट करती हुई कह रही है कि जिस दिन से मुझे प्रियतम कृष्ण दिखाई दिये है, उसी दिन से उस मन-भावन और चितचोर के वियोग को मै एक पल के लिए भी सहन नही कर पाती । बंक बिलोचन सवैया मैन मनोहर नैन बडे सखि सैननि ही मनु मेरो हर्यौ है । गेह को काज तज्यौ रसखानि हिये ब्रजराजकुमार अर्यौ है ॥ आसन-वासन सास के आसन पाने न सासन र ग पर्यौ है । नेननि बक बिसाल की जोहनि मत्त महा मन मत्त कर्यौ है ॥ ६६ ॥