रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—मैन मनोहर=कामदेव के समान सुन्दर । आसन-वासन= आशाओ की वासना से । त्रासन=डर । सासन=साँसो मे । रंग=प्रेम । मत्त=उन्मत्त, पागल । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के नेत्र कामदेव के नेत्रो के समान सुन्दर और विशाल है । उन नेत्रो के सकेत से ही उसने मेरे मन को हर लिया है । रसखान कहते है कि तभी से कृष्ण हमारे हृदय मे बस गया है और उसके प्रेम के कारण मैने घर का काम करना भी छोड़ दिया है । आशाओ की वासनाएँ सासु के भय को भी नही मानती, क्योकि मेरी साँसो मे कृष्ण का प्रेम भरा हुआ है । कृष्ण ने अपने विशाल नेत्रो की तिरछी दृष्टि से मेरे मन को अत्यन्त पागल बना दिया है । विशेष—तृतीय पक्ति मे अनुप्रास अलकार । सवैया भटू सुन्दर स्याम सिरोमनि मोहन जोहन मैं चित चोरत है । अवलोकन वक विलोचन मैं ब्रजवालन के दृग जोरत है ॥ रसखानि महावत रूप सलोने को मारग ते मन मोरत है । ग्रह काज समाज सबै कुल लाज लला ब्रजराज को तोरत है ॥६७॥ शब्दार्थ—भटू=सखी । सिरोमनि=शिरोमणि । दृग जोरत है=आँखें मिलाता है, प्रेम करता है । सलोने को=सौन्दर्य का । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सुन्दर और शिरोमणि कृष्ण मन को मोहने वाला है और देखते ही मन को चुरा लेता है । वह अपने वक्र नेत्रो से देखते ही ब्रजवालाओ के नेत्रो को अपने नेत्रो से जोड लेता है । रसखान कहते है कि उसका सौन्दर्य रूपी महावत हमारे मन रूपी हाथी को अपने मार्ग से मोड़ देता है । वह ब्रजराज सभी गृह-कार्यो को, समाज को और कुल की लाज को तोड़ देता है । विशेष— रूपक अलंकार । पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— ‘रसखान महावर रूप सलौने को मारग ते मन मोरत है ।’